Saturday, September 27, 2014

श्रीमती कुर्सी का हो पंचवर्षीय द्रौपदीकरण


- सोनम गुप्ता

भाजपा और शिवसेना के 25 वर्षों के हेल्दी रिलेशनशिप के बावजूद अब उनका तलाक हो गया। यहां कांग्रेस और राकांपा का भी 15 साल पुराना रिश्ता टूट गया।आज-कल माहौल ही तलाक का है। जहां देखो वहां वर्षों पुराने रिश्ते चटककर बिखर रहे हैं। हर कोई अकेले चलने की कोशिश में है। हर कोई अपनी ताकत आजमाने की फिराक़ में है।
        मजे की बात तो यह है कि कांग्रेस- राकांपा और शिवसेना-भाजपा के गठबंधन की गांठे क्या खुली सैकड़ों  घरों में दिवाली मन गयी। जो लंबे अरसे से वोट मांगने का सपना सजो रहे थे। आज उनकी पार्टियों के  अकेले चलने की जिद ने उन्हें मौका दे दिया है।
अब महाराष्ट्र के चुनावी मैदान में पांडवों की तरह पांच राजनितिक पार्टियां आमने-सामने खड़ी हैं। और इन सभी के तलाक के पीछे भी एक स्त्री है। यह एक ऐसी स्त्री है, जिसपर स्त्रियां भी अपनी जान छिड़कती हैं। वह है श्रीमती कुर्सी। मुख्यमंत्री की कुर्सी। फिर ममता हो या जयललिता।  माया हो या वसुंधरा। सब इसी श्रीमती कुर्सी की दीवानी हैं। 
महाराष्ट्र में इसी कुर्सी को पाने के लिए लालायित ये सभी दल अकेले अपने दम पर ही रेस लगाने को तैयार हो गए हैं। कल तक जो गलबहियां करते थे, आज वो पोस्टर-बैनर लेकर एक-दूसरे के दरवाजे पर गला काटने को आमादा हैं। लेकिन  ऐसी स्तिथि में जनता बहुत दुविधा में हैं।
जनता सोच में है। किसका साथ दे। इस बार किसको अपने सिर पर बिठाकर नचाये। किसकी जूती खाएं। किसकी सभा सजाए। किसका भोजन बन जाएं। जनता के तो सारे समीकरण ही बिगड़ गए।
      कुर्सी के लिए पांडवों की तरह पांच राजनीतिक दलों की लड़ाई में जनता उर्फ़ कुंती की स्थिति ख़राब है। इसलिए अब कुंती को पुराने महाभारत से सीख लेते हुए इन सभी पांडवों को आपस में लड़ने से रोक देना चाहिए। ये पांचों पार्टियां दरवाजे पर कुर्सी के साथ खड़ी हो जाएं। अर्जुन द्रौपदी को लाये या युधिष्ठिर या भीम। द्रौपदी को तो सबकी सेवा करनी है। सबको तृप्त करना है। इसलिए मुख्यमंत्री की कुर्सी को 5 पार्टियों के बीच एक-एक बरस के लिए आवंटित कर देना चाहिए। वैसे भी ये पांचों पार्टियां मौसेरे भाई हैं। सबका मकसद सिर्फ कमाई है। इन भाइयों में अब एक कुर्सी के लिए लड़ाई हो, तो ठीक नहीं। वैसे भी जन शोषण हर हाल में होना है। राजा ये हो तब भी और वो हो तब भी । इससे तो अच्छा हो कि जनता भी कुर्सी को पांचों पार्टियों में बराबर सालों के लिए बांटकर इस चुनावी नाटक से छुट्टी पा जाए। क्योंकि चुनाव कोई भी जीते हार तो जनता जनार्दन की ही होनी है।

कैप्शन जोड़ें


Wednesday, September 24, 2014

क्यों न ऑनलाइन हो चुनाव के टिकट की बुकिंग

व्यंग्यबाण

बतरस-25.9.14

- सोनम गुप्ता

रेल टिकट हो या एयर टिकट, आजकल सब कुछ ऑनलाइन मिलता है। लोगों को घर बैठे सब कुछ बुक करने की यह सुविधा बहुत भा गई है। न लाइन की किच-किच, न घंटों खड़े रहने का झंझट। साइट खोली, यहां-वहां उंगलियां घुमाईं, जानकारी भरी और टिकट बुक। बुकिंग के क्षेत्र में इस क्रांतिकारी सुविधा का लाभ क्यों न राजनीति में भी उठाया जाए। जल्दी ही कई राज्यों में चुनाव होने वाले हैं। उनमें यह प्रयोग किया जा सकता है। क्यों न चुनाव के टिकट भी ऑनलाइन ही बांटे जाएं। इससे राजनीति में पारदर्शिता आएगी। आज भ्रष्टाचार खत्म करने के लिए यदि किसी क्षेत्र में सबसे अधिक बदलाव करने की आवश्यकता है तो वह सियासत ही है। पॉलिटिक्स में पारदर्शिता आने का मतलब होगा देश से भ्रष्टाचार का खात्मा।
वैसे भी आजकल ज्यादा से ज्यादा सरकारी प्रक्रियाओं को ऑनलाइन करने का ट्रेंड चल रहा है। आम आदमी भी खुश है कि घर बैठे कंप्यूटर पर लाइसेंस से लेकर नौकरी तक का पर्चा भरने मिल रहा है। बिचौलिया जा रहा है, ट्रांसपेंरेंसी आ रही है। चुनाव के वक्त टिकट आवंटन को लेकर हर पार्टी में बहुत मारामारी मचती है। अखबारों में ये खबरें तो आम हो जाती है कि फलाने ने ढिमाके का टिकट मार लिया। फलाने ने तो पार्टी को लाखों का फंड अपनी उम्मीदवारी के बदले दिलाया था, लेकिन ऐन चुनाव के वक्त उनका पत्ता साफ हो गया। अब जनता के प्रतिनिधियों के साथ ऐसी धोखाधड़ी और नाइंसाफी होगी, तो जनता जनार्दन के भविष्य का क्या होगा। इसलिए राष्ट्र के कर्णधारों के हित में अब बेहद जरूरी हो गया है कि चुनाव लड़ने को इच्छुक उम्मीदवारों को टिकट भी ऑनलाइन ही जारी किया जाए। इससे कई तरह के फायदे होंगे। चुनाव कार्यक्रम घोषित होने के बाद पार्टी कार्यालयों और सीनियर लीडरों के घरों के आगे जो भीड़ लगती है, वह बंद हो जाएगी। टिकट को लेकर नारेबाजी, सिर फुटौव्वल खत्म हो जाएगा। अब टिकटार्थियों को ऑनलाइन अप्लाई करना होगा। वे ऑनलाइन अप्लीकेशन में जितना चाहें, अपने बारे में बखान कर सकते हैं, डींगे हांक सकते हैं। ऐसे तो आलाकमान के पास उन्हें सुनने का वक्त नहीं होता। अब आलाकमान चैन से उनके आवेदन को पढ़ सकता है। अब वे लोग भी अपना आवेदन कर सकेंगे जिन्हें टिकट मांगने में शर्म आती है पर दिल के किसी कोने में झक्क सफेद कुर्ते को दीन-गरीबों के सामने फैलाकर वोट मांगने का सुनहरा सपना पलता रहता है। ऐसे सज्जन पुरुष भी चुपचाप कमेरे में अकेले बैठकर अपनी दबी हुई महत्वाकांक्षाओं को ऑनलाइन कर देंगे। फिर अतिपारदर्शी ऑनलाइन प्रक्रिया में बहुत संभव है कि कई सालों की उनकी रहस्यमय तपस्या सफल हो जाए।
इतना ही नहीं पार्टी की उम्मीदवार चयन समिति को भी इसेटिकट दो या उसे दो , इस उम्मीदवार से इतना लो या वोउसका रिश्तेदार है उससे मत लो के झंझट में नहीं पड़नापड़ेगा। और बाद में टिकट न मिलने पर इस लेन - देन काहिसाब - किताब करने आए लोगों के मुंह भी नहीं लगनापड़ेगा। भई , सब ऑनलाइन होगा , कोई बिचौलिया नहींकोई धांधली नहीं। तो फिर सवाल - जवाब या शक - शंकाका तो कोई सवाल ही नहीं उठता।
लेकिन यदि आवेदनों के अत्याधिक भार की वजह सेउम्मीदवार चयन की यह साइट खुलते ही आईआरसीटीसीकी साइट की तरह हैंग हो गई तो इसमें पार्टी और उम्मीदवारचयन समिति का कोई दोष नहीं। और न ही साइट के पुन :सुचारू रूप से चलने पर टिकट समाप्त हो जाने पर पार्टी परकिसी भी प्रकार का संदेह करने की जरूरत है। अबटैक्नीकल फॉल्ट के लिए पार्टी क्या करे। वैसे सब कुछटैक्नीकल हो जाने का एक और लाभ है। मान लीजिए किसीबड़े नेता के किसी करीबी रिश्तेदार ने शिकायत की कि उन्हेंटिकट नहीं मिला , तो नेताजी कह सकते हैं कि क्या करें ,टिकट तो उन्हें अलॉट कर दिया गया था पर किसी टैक्नीकलप्रॉब्लम की वजह से उनका नाम नहीं आ सका।
इंट्रो : आज आम आदमी खुश है कि घर बैठे कंप्यूटर पर हीलाइसेंस से लेकर नौकरी तक का पर्चा भरने मिल रहा है।बिचौलिया जा रहा है , ट्रांसपेंरेंसी आ रही है।

http://navbharattimes.indiatimes.com/jokes/satire/btrs-25-9-14/hansimazakshow/43336080.cms

NBT में 25 सितंबर को  प्रकाशित 


Friday, September 19, 2014

जरुरी है औरत का उखड़ना


एक लंबी कविता के एडिटिंग के दौरान उसमें से कटकर निकले हुए कुछ अवशेषों से ये कविता बनी है। जिसे आपके साथ सांझा कर रही हूँ।

- सोनम गुप्ता


एक लड़की कर सकती है शादी से इंकार
सजा सकती है सपने
भर सकती है ऊंची उड़ान
हंस सकती है खुलकर
कर सकती है वह सबकुछ
जो हक है उसका
लेकिन
पापा, चाचा, मामा, ताई, मम्मी और पड़ोसी सब
नहीं भूलने देंगे उसे
कि
वह जन्मी है संस्कारों के देश में
पंडितों और पुजारियों के प्रदेश में
जहां औरत इंसान नहीं
केवल सामान है
घर का सम्मान है
मान-मर्यादा और अपमान है
उसे दबना है
चुप रहना है
सपनों को मार कर भी खुश रहना है। 

लड़कीनुमा पोधे का
पनपना जरुरी है
उखड़ने के बाद भी जरुरी है
उसका फलना फूलना
ताकि फसलें जिंदा रहें
ताकि नस्लें जिंदा रहें
फिर चाहे गल जाए एक लड़की का शरीर
दरक जाए दिल
पर नस्ल जिंदा रहनी चाहिए। 

एक अंकुर को पैदा करने के लिए
गलना पड़ता है बीज को
सहना पड़ता है दर्द जननी को।

फ्रीडा काहलो की एक पेंटिंग- साभार: अमिताभ श्रीवास्तव 

Saturday, July 5, 2014

पर कटा पंछी


- सोनम गुप्ता 

-1-
आसमान को ताकता पर कटा पंछी
उड़ना चाहता है
एक पल के लिए भूल जाता है
कि उसके पंख कतर दिए गए हैं
वो पंछी भरना चाहता है अपने सपनों की उड़ान
वह पर कटा पंछी आसमान की ओर देखते हुए
कोशिश करता है, ऊछलता है
लेकिन, धड़ाम से गिर पड़ता है औंधे मुंह
जालियों से घिरी चार दिवारी के भीतर।

-2- 
पिंजरा,
जहां दाना है, पानी है
हवा है, खिलौना है
लेकिन आजादी नहीं है
पंछी रोक नहीं पाया उन्हे, अपने पर कतरने से
पंछी को लगता रहा हमेशा
अपने ही परों पर अधिकार नहीं है उसका,
हक है, किसी और का इन पंखों पर।

-3-
वह चिल्लाता है, चीखता है
पूरी ताकत से छुड़ा लेना चाहता है खुद को शिकंजे से
लेकिन
मालिक पैसा कमाना चाहता है
पर कटे परिंदे का खेल दिखाकर,
पंछी के पर कतरकर खुद भरना चाहता है ऊंची उड़ान।

-4- 
मालिक  तो मालिक ठहरा
और पंछी बेजुबान
पंछी की आंखों में कातरता और मालिक की आंखों में क्रूरता होती है,
नोंच कर उखाड़ दिए एक-एक करके सभी वो पंख उसके
जो दे सकते थे उड़ान
पिंजरे में कैद पंछी उड़ने की आस नहीं रख सकता
कुतुहल का केंद्र है पिंजरे में बंद पंछी
मान-मर्यादा का प्रतीक है ये बिना पर का पंछी।

-5-
पर आजादी है
पर मनमुताबिक जीने का साधन है
पर स्वावलंबी होने की निशानी है
पर अभिमान है
पर अपने सामर्थ्य की पहचान है
पालतू बनाने के लिए पंछी को
पर काटना जरूरी है
वरना ये पंछी पिंजरा तोड़कर जी लेगा अपनी जिंदगी
जो पर काटनेवाला नहीं कर पाया
वह उड़ान भर लेगा ये परवाला पंछी
इसका घुट-घुटकर मरना जरूरी है
इसके सपनों का टूटना जरूरी है
मान-सम्मान का ढोंग रचना जरूरी है
पंछी के लिए पिंजरा है
खुली डालियों पर तो बैठते हैं
आवारा, बेपरवाह और मस्तमौला पंछी
अपने पर को मजबूत करते
मीलों उड़ाने भरते
जी भरकर जीते, विहंग करते पंछी
पिंजरे के भीतर से
देखता, ताकता नसीब को कोसता पर कटा पंछी
काट दिए गए जिसके पंख
मान-मर्यादा और संस्कार के नाम पर
अब सिर्फ आसमान में उड़ते हुए पंछियों को ताक रहा है,
वह पर कटा पंछी।

- 6-
शरीर भले ही न उड़ पाए
लेकिन मन की उड़ान अब भी
दूर क्षितिज तक भर लेता है
अपनी आंखों में
वह पर कटा पंक्षी।



Thursday, June 19, 2014

शिवसेना के 48 पायदान पार

शिवसेना के लिए सबसे ज्यादा सफल 48वां साल



मनोहर जेाशी और नारायण राणे शिवसेना के इतिहास में अब तक बने मुख्यमंत्री 


- सोनम गुप्ता

मुंबई। आमतौर पर 48 वर्ष की आयु में व्यक्ति को अधेड़ कहा जाता है। अधेड़ मतलब न तो बूढ़ा और न ही जवान। राजनीति और राजनीतिक दल के मामले में 48 वर्ष की उम्र युवा अवस्था के प्रारंभ का साल होता है। शिवसेना की स्थापना को 19 जून, गुरूवार को 48 साल पूरे हो गए है। सही मायनों में यही वह समय है, जब शिवसेना पूरे जेाश व उत्साह के साथ नौजवान नजर आ रही है। शिवसेना के लहराते हुए नवयौवन का कारण है, 2014 के लोकसभा चुनाव में मिली अपार सफलता। शिवसेना ने महाराष्ट्र में 18 सीटें जीतकर अपने युवा व ताकतवर होने का नजारा दिखा दिया है।
   उत्साह और उमंग का ही नतीजा है कि शिवसेना ने अपने स्थापना दिवस पर पहली बार दो दिवसीय चर्चा-परिचर्चा, विचार-विमर्श और भविष्य व निकट भविष्य में होनेवाले विधानसभा चुनाव की रणनीति बनाने के लिए लगातार दो दिन तक मंथन की प्रक्रिया बांद्रा के रंगशारदा में आयोजित की। 


शिवसेना की चर्चित शिवजी पार्क की दशहरा रैली 


शिवसेना के 4 बड़े बागी - भुजबल, राणे, नाईक और राज 

     सन 2004 से उद्धव ठाकरे ने कार्यकारी अध्यक्ष के नाते शिवसेना की कमान संभाली। इससे पहले शिवसेना और भाजपा गठबंधन में 1995 से लेकर 1999 तक महाराष्ट्र में सत्ता का उपभोग किया। उद्धव ठाकरे के हाथों में शिवसेना की कमान आने के बाद लगातार ऐसा आभास होता रहा कि शिवसेना लगातार कमजोर होती जा रही है। उद्धव ठाकरे के नेतृत्व पर कभी पूर्व मुख्यमंत्री नारायण राणे, तो कभी उद्धव के ही चचेरे भाई राज ठाकरे ने सवाल खड़े किए। इतना ही नहीं उद्धव और शिवसेना के अन्य नेताओं के बीच विवाद इतने बढ़ गए कि जुलाई 2005 में नारायण राणे को पार्टी से बरखास्त कर दिया गया। शिवसेना से निकाले जाने के तुरंत बाद राणे ने शिवसेना के अपने कट्टर समर्थक विधायकों को अपने साथ लिया और कांग्रेस का दामन थाम लिया। कांग्रेस ने राणे को हाथों-हाथ लिया और तुरंत राज्य सरकार में कैबिनेट मंत्री भी बना दिया। 
       उसके बाद 27 नवंबर 2005 को उद्धव ठाकरे के चचेरे भाई राज ठाकरे ने शिवसेना के सभी पदों से इस्तीफा दे दिया। राज को मनाने-समझाने का असपफल प्रयास किया गया। राज को अपना नेता माननेवाले हजारों शिवसैनिकों ने राज ठाकरे के साथ पार्टी छोड़कर जाने का निर्णय ले लिया। राज के साथ न तो शिवसेना का कोई बड़ा पदाधिकारी गया और न ही विधायक व सांसद। लेकिन राज और राणे के शिवसेना छोड़ने से उद्धव ठाकरे की राजनीतिक क्षमता और कुशलता पर प्रश्न चिन्ह लग गया। 
     2007 में मुंबई महानगर पालिका के चुनाव हुए। उद्धव के नेतृृत्व में शिवसेना ने एक बार फिर जीत हासिल की। वहीं 2009 के विधानसभा चुनाव में जब शिवसेना के विधायकों की संख्या घटकर भाजपा के विधायकों से कम हेा गई, तो एक बार पिफर उद्धव ठाकरे के नेतृत्व पर सवाल खड़े हो गए। 17 नवंबर 2012 को शिवसेना प्रमुख बाला साहेब ठाकरे के निधन के बाद से शिवसेना की कमान पूरी तरह उद्धव ठाकरे के हाथों में आ गयी और 2014 के लोकसभा चुनाव में 18 सीट जीतकर अक्षम नेतृत्व कही जानेवाली शिवसेना पिफर से सक्षम नेतृत्व के हाथों में सुरक्षित माने जाने लगी। 
      मार्मिक में छपी एक खबर से हुई शिवसेना की शुरूआत शिवसेना की स्थापना 19 जून 1966 को मराठी साप्ताहिक मार्मिक में एक छोटी-सी खबर छापे जाने के बाद हुई। जब शिवसेना के संस्थापक बाला साहेब ठाकरे ने यह खबर छापी थी। तब उन्होने भी नहीं सोचा था कि मार्मिक में अंदर के पृष्ठ पर छपी किसी खबर का महाराष्ष्ट्र के मराठी मन पर इतना व्यापक असर होगा कि शिवसेना रातो-रात लोकप्रिय हो जाएगी। दक्षिण भारतीयों का अधिकतर सरकारी नौकरियों और बड़े पदों पर कब्जा मराठियों के मन में आक्रोश  पैदा कर चुका था। अन्य राज्यों से आकर मुंबई में नौकरियों पर कब्जा करने का मुद्दा बेरोजगार मराठी युवकों के मन पर छा गया और शिवसेना के भगवा झंडे तले महाराष्ट्र के विकास का स्वप्न मराठी मानुस देखने लगा।
स्थापना के बाद शिवसेना ने ठाणे महानगर पालिका का चुनाव लड़ा और इसमे अपार सफलता मिली। 1971 में शिवसेना ने मुंबई महानगरपालिका पर कब्जा किया और हेमचंद्र गुप्ते पहले शिवसैनिक महापौर बने। जिसके बाद बाला साहेब ठाकरे और उनके कर्मठ साथियों का उत्साह कई गुना बढ़ गया। इसके बाद शिवसेना ने विधानसभा, लोकसभा, मनपा, आदि के कई चुनाव लड़े, लेकिन शिवसेना अपेक्षित सपफलता से दूर ही रही। 


1985 में हुई भाजपा से शिवसेना की युति 

        1985 में भाजपा के नेता प्रमोद महाजन की पहल पर भाजपा का शिवसेना के साथ गठबंधन किया गया। शिवसेना ने भी धीरे-धीरे अपनी प्रांतवादी सोच को बदलकर हिंदुत्व की सोच को अपनाया। यही वजह है कि शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे को  हिंदुहृदय सम्राट कहा जाने लगा। वहीं प्रमोद महाजन भाजपा-शिवसेना युति के शिल्पकार कहलाए। 1990 के विधानसभा चुनाव में शिवसेना और भाजपा को बेहतरीन सपफलता मिली। शिवसेना ने 52 और भाजपा ने 42 सीटों पर जीत हासिल की। विधानसभा में तेज-तर्रार माने जानेवाले ओबीसी नेता छगन भुजबल विपक्ष का नेता बनना चाहते थे। शिवसेना प्रमुख बालासाहेब ठाकरे ने भुजबल को यह पद देने की हामी भी भर दी थी। लेकिन अचानक भुजबल की जगह मनोहर जोशी को विपक्ष का नेता बना दिया गया। इससे छगन भुजबल बेहद आहत हुए। दिसंबर 1991 में नागपुर अधिवेशन के दौरान अचानक छगन भुजबल ने शिवसेना से बगावत कर और अपने साथ 17 विधायक लेकर कांग्रेस में शामिल हो गए। यह शिवसेना के लिए सबसे बड़ा झटका था। विधानसभा में शिवसेना की सीटें भाजपा से कम हो गई और ज्यादा सीटों के बल पर विपक्ष के नेता का पद भाजपा के गोपीनाथ मुंडे के पास चला गया।
 शिवसेना-भाजपा गठबंधन में 1995 में पहली बार सबसे बड़ी सपफलता हासिल हुई। शिवसेना-भाजपा ने निर्दलीयों के साथ मिलकर महाराष्ट्र में सरकार बनाई। मनोहर जोशी शिवसेना के पहले और नारायण राणे शिवसेना के दूसरे मुख्यमंत्री बने। 
        शिवसेना प्रमुख बाला साहेब ठाकरे अपनी धारदार भाषण शैली के लिए पहचाने जाते रहे। शिवसेना प्रमुख ने पहली स्थापना के बाद मुंबई के शिवाजी पार्क पर दशहरा के दिन रैली की। उसके बाद मुंबई में दशहरा का दिन, दादर का शिवाजी पार्क और बाल ठाकरे एक-दूसरे के  पर्याय बन गए। शिवसेना की यह रैली अपने इतिहास में एक मात्र ऐसी रैली है, जो एक नेता, एक दिन के तौर पर विश्वकीर्तिमान बनाए जानेवाली रैली कही जाती है। अब तक के शिवसेना के इतिहास में सिर्फ दो बार किन्ही कारणों से इस रैली का आयोजन नहीं किया गया और 2 से 3 बार इस रैली का समय रात के बजाय दिन में किया गया था। इन अपवादों के अलावा यह रैली शिवाजी पार्क में अनावरत और अबाध चलती रही। ठाकरे की भाषण शैल्य ठाकरी भाषा के तौर पर प्रचलित हुई।

ठाकरे परिवार ने नहीं लड़ा कोई चुनाव

पार्टी के 48 सालों के इतिहास में शिवसेना प्रमुख बालासाहेब ठाकरे और उनका परिवार एकमात्र ऐसा राजनीति परिवार था, जिसने कभी कोई चुनाव नहीं लड़ा और न ही कभी कोई सरकारी पद स्वीकार किया। बालासाहेब ठाकरे को राजनीति में पारस का पत्थर कहा जाने लगा था। उन्होने जिस भी आम आदमी को चहा उस आदमी को नगरसेवक, विधायक, सांसद और मंत्री बना दिया। फिलहाल, बालासाहेब ठाकरे के जाने के बाद उद्धव ठाकरे ने पार्टी की कमान संभाली है। वहीं तीसरी पीढ़ी के आदित्य ठाकरे बालासाहेब ठाकरे के सामने ही युवासेना की कमान संभाल चुके हैं। 


शिवसेना की लोकसभा में स्थिति-
1989 - 1 सीट
1991- 4 सीट
1996- 15 सीट
1998- 6 सीट
1999- 15 सीट
2004- 12 सीट
2009- 11 सीट
2014- 18 सीट

शिवसेना की विधानसभा में स्थिति*- 
1990- 52 सीटें
1995- 73 सीटें
1999- 69 सीटें
2004- 62 सीटें
2009- 45 सीटें
 * पार्टी को मान्यता मिलने के बाद से

Monday, April 7, 2014

मामा बोला ऑल द बेस्ट!


- सोनम गुप्ता 


        सुबह-सुबह ट्रेन 15 मिनट लेट चल रही थी। देरी की वजह से ट्रेन में भीड़ देखने लायक हो गयी थी। समय से पहुंचना था इसलिए कुछ भी कर, कैसे भी उस ट्रेन में चढ़ना बहुत जरुरी था। मैं डरते हुए, सहमते हुए, रेल के नियमों का उल्लंघन करते हुए बोगी के फूट ब्रीज पर सवार हो गयी। वाशी पहुंचने तक मेरी स्थिति में कोई सुधार नहीं आया। वाशी ब्रीज आते ही कुछ लोगों ने मुझपर तरस खाकर मुझे बोगी के अंदर यानि खुली हवा से लोगों के पसीनों से गंधित हवा के बीच प्रवेश करने का मौका दिया। मैं जैसे-तैसे एक-एक स्टेशन में खुद को संभालती हुई बोगी के अंदर बैठने की जगह तक पहुंच गयी।  कुर्ला आया और महिला बोगी ने कुछ सास ली। वडाला आने तक बैठने की आधी जगह तो मिल ही गयी। मैंने हाथ में मुड़े हुए किताब को खोला और रिवीजन करना शुरु कर दिया।

      सीएसटी में उतरते ही लगभग दौड़ते हुए टैक्सी स्टैंड तक पहुंची। और टैक्सी को अपने गंतव्य स्थान तक जाने के लिए रुकाने का असफल प्रयास करने लगी। कुछ 3-4 मिनट बीत गए लेकिन कोई टैक्सी केसी कॉलेज जाने के लिए तैयार ही नहीं हुई। मुझे भी कोई बहुत ज्यादा देरी नहीं हो रही थी।  बस समय से पूर्व पहुंचने की इच्छा थी। सुबह-सुबह टैक्सीवालों पर बड़बड़ाने का मन भी नहीं था इसलिए शांति से टैक्सी ढूंढने का कार्य मैं बेहद तल्लीनता के साथ कर रही थी।  तब ही वहां करीब खड़े मामा यानि ट्रैफिक हवलदार ने मुझसे पूछा, 'एग्जाम आहे का?' मैंने आश्चर्य व संदिग्ता दोनों के भाव एक साथ चेहरे पर लाकर जवाब दिया, 'हो।' मेरे हाथ में फ़िलहाल कोई किताब नहीं थी। ट्रेन में ही वह बुक बैग में जा चुकी थी। ऐसे में मामा को कैसे पता लगा कि मेरी परीक्षा है। इतना  मैं सोच ही पायी थी कि उन्होंने मुझसे कहा, "इकडेच थांब। कुठे जाउ नकोस।" इतना कहकर वो आगे चले गए। मैं, उन्हें वहीं खड़ी होकर देखती रही। उन्होंने सड़क के उस पार जाकर एक टैक्सीवाले को हाथ दिखाकर बुलाया। वो टैक्सीवाला अनमना-सा मुंह बनाकर उनके पास अपनी टैक्सी ले आया। उन्होंने टैक्सी को मेरी ओर लाने का इशारा किया और खुद भी कुछ हद तक दौड़ते हुए आए। मुझे टैक्सी में बैठने के लिए कहा और टैक्सीवाले को हिदायत दी कि "इसे केसी कॉलेज के एकदम गेट के पास छोड़ना। इसका एग्जाम है।" टैक्सीवाले ने एकदम अरुचिवाला भाव बनाकर पतले-दुबले मामा को पूरी तरह नजरअंदाज़ करने के लहजे में गियर लगाया।
इतने में आंखों पर चश्मा लागाये मामा ने मुझे टैक्सी में बैठा देखकर इत्मीनान जताते हुए संकोच भरी आवाज़ में कहा, "चांगला कर। आल द बेस्ट।"
       मैं, कुछ सोच या कह पाती उससे पहले टैक्सीवाले ने उदास-सा चेहरा बनाकर एक्सीलरेटर  को दबा दिया। मेरे मुंह से केवल एक ही शब्द मुस्कान के साथ फूटी, "थैंक यू।"


Wednesday, March 26, 2014

मुझपर तुम एक एहसान करो, अपना मत मुझे दान करो।


- सोनम गुप्ता

तुम तो मेरा सम्मान करो,
यूं न मेरे गुण-दोष गिनो,
मुझपर तुम एक एहसान करो,
अपना मत मुझे दान करो।

मैं, एक नेता हूं,
माना तुम्हे कुछ नहीं देता हूं,
चुनाव आने पर
अच्छा अभिनय कर लेता हूं।
वोट मांगने के लिए
तुम्हारे दर पर आया हूं
कुछ रूपए और बोतल भी
अपने साथ मैं, लाया हूं
ना दुत्कारों ऐसे
ना यूं मेरा अपमान करो,
मुझपर तुम एक एहसान करो,
अपना मत मुझे दान करो।


5 साल में पूरे केवल,
एक बार ही
हाथ जोड़कर करता हूं मैं तुमसे याचना
स्वीकार करो
हे कर्ता-धर्ता,
मेरी प्यारी-दुलारी जनता,
मेरी विनम्र प्रार्थना
तेरे ही आर्शीवाद से
संभव है दिल्ली में मेरी सत्ता।

सड़क, पानी, बिजली को ना तुम याद करो,
सिर्फ और सिर्फ विकास की अब बात करो,
मुझपर तुम एक एहसान करो,
अपना मत मुझे दान करो।


गेहूं सड़ते हैं तो सड़ने दो,
तुम मुझको अपना मत दान करो,
आने पर सत्ता
इन्हे गोदामों में रखवा देंगे,
ओले गिरते है तो गिरने दो,
कुछ किसान मरते है, 
तो मरने दो,
दो-चार किसानों का बीमा भी करवा देंगे।

तंग रस्तों से,
गलिच्छ गलियों से,
झेलकर बहुत कष्ट,
द्वार तक तुम्हारे पहुंचा हूं,
ये दीन-दुखियारे, 
अब तुम ही मेरे रखवाले,
2 रोटी अपनी खिलाकर,
मेरे प्रचार में चार-चांद जड़ो,
तुम मेरा यह सविनय निवेदन,
कृप्या अब स्वीकार करो,
मुझपर एक एहसान करो,
अपना मत मुझे दान करो...

Wednesday, March 5, 2014

वोट के बाजार में नेता ब्रांड के फुटकर व्यापारी


-         सोनम गुप्ता


बिक रहे हैं कुछ लोग यहां। जहां पहले बिकते थे केवल टोपी, कुर्ता और कलम। अब बिकने लगे हैं वहां उन टोपियों के नीचे खोपड़ीयां। झक्क सफेद कुर्तों के साथ एक हृष्ट-पुष्ट शरीर। कलम थामें लाल स्याही से हस्ताक्षर करनेवाले हाथ। पहले जिस रेल्वे स्टेशन पर अपना पेट भरने के लिए फुटकर बेचनेवाला 10 रूपए से लेकर 100 रूपये तक की वस्तुएं बेचता था। शर्ट ले लो, सेंट ले लो, केला, अंगूर, संतरा सब कुछ प्रतिबंधित प्लास्टिक की पतली झिल्लीयों में देता था। आज वहीं टाय लगाए, टिप-टॉप फार्मलस् पहने लड़के-लड़कियां कागज और कलम लिए बेच रहे हैं। जी नहीं, कागज और कलम नहीं बेच रहे। वे तो नेताजी को बेच रहे हैं।
 यहां ये देखकर बहुत अच्छा लगा कि अब देश की राजनीति में युवा पीढी बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रही है। फिर चाहे वह बात चुनाव लड़ने की हो या मतदान करने की। देश के युवाओं के इसी रूझान को देखते हुए सभी पार्टियों ने अपने-अपने पार्टी में नए चेहरे, युवा चेहरे, युवा मोर्चा, युवा सेना सबकुछ युवामय कर दिया है। जब पापा को अपने बच्चे को पायलट बनाना होता है, तो बचपन में ही वह उसे खिलौनी की जहाज उड़ाने के लिए दे देता है। यहां भी हर पार्टी के अध्यक्ष ने अपने-अपने सयाने हो गए बेटों को विभिन्न प्रकार के युवा मोर्चो का अध्यक्ष बना दिया है। देश के स्वतंत्र आसमान में अपना नीजि हैलीपैड बेधड़क उड़ाने के लिए अभी से तैयार करना जरूरी है, ना। 
खैर, रेल्वे स्टेशन पर हमारे देश के कुछ आम युवा प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवारों को जनता की बाजार में बेचने का काम कर रहे थे। आइए, आइए फला नेता को प्रधानमंत्री बनाने के लिए हमारी दुकान पर अपना नाम, नंबर लिखवा जाइए। अपने बेशकीमती वोट को हमारे नेताजी के नाम पर बली चढ़ा आइए। अरे हमारे नेताजी फलां नेता से ज्यादा युवा हैं। तो क्या हुआ अगर उनके सारे बाल पक गए हैं। उम्र 50 पार कर चुकी है। सामनेवाले विरोधी भला कौन-से 22 के हैं। हमारे नेताजी बेहद नई सोचवाले, लेटेस्ट टेकनालॉजी का इस्तेमाल करनेवाले हैं। फिर चाहे बात दंगे करवाने की हो या कोई घोटाला छिपाने की हो। अरे...अरे जरा एक मिनट तो यहां देख लो। भई, हमारे नेताजी की दुकान पर आ जाओ। बहुत ही किफायती और टिकाऊ माल है। 5 साल से ज्यादा का वादा है। एक बार वोट दोगे, तो दूजी बार तो कुर्सी हम छोड़ेंगे ही नहीं। आप तो बस खरीद ही लो। बिकाऊ नहीं है हमारे नेताजी। लेकिन हां, दाम तो लगेगा ही। मंदिर में भगवान को भी जब प्रार्थना की मंजूरी के लिए रिश्वत देनी पड़ती है, तो हमारी क्या औकात।
एक सूट-बूटवाले फुटकर व्यापरी ने बताया कि वो किसी विदेशी कंपनी में कार्यरत है और मुफ्त में देश सेवा के लिए अपने इस प्रिय नेता का प्रचार कर रहा है। क्योंकि उसके नेता का नारा ही मुझे लाओ देश बचाओ हैं।  दूसरी ओर से वहां का पुराना फुटकर व्यापारी अपना झोला-झंडा ऊठाकर देश बचाओवालों पर फूट पड़ा। वो जिन नेताजी को बेचने आया था। वे एकदम युवा, इतने की कुछ तो बच्चा भी समझ लेते। गरीबों के रहनुमा, मां के लाडले। अब यहां से भी जोर-शोर से ग्राहकों को पटाने की चिल्लाहट मचने लगी। जनता कन्फूयज हो गई किस को खरीदें। देानों ही झक्क सफेद कुर्ताधारी, युवा, गरीबों की और गरीबी की बात करनेवाले, किसानों का लोहा मानने और मांगनेवाले। यहां मामला गरमाने लगा।
        एक नेता बेचनेवाला दूसरे पर चढ़ने लगा। वह अपने माल को बेहतरीन और टिकाऊ बताता, तो दूसरा अपनेवाले को मार्केट का युवा व सबसे पुराना बै्रंड बताता। मेरा ले। नहीं, नहीं मेरावाला। अरे, उसने घोटाले किए हैं। अरे उसने तो जान लिए हैं। अरे हमारे नेताजी तो युवाराज हैं। वो तो यमराज हैं। अरे, उसका इतिहास कमजोर है। अरे, उसे तो इतिहास पता ही नहीं। अरे, इतिहास छोड़ो भूगोल देखो।  इतने में तीसरा केवल गांधी टोपी पहने अपने नेता का प्रचार करने पहुंचता है। बाकि दोनों को ढोंगी बताकर खुद का सिक्का जमाने लगता हैं। 1 से 3 का शोर अब हाथा-पाई में बदल जाता है। इस हल्ला हो में आम आदमी पगला जाता है। सोचता है, इस दुकान से किसी को भी खरीदू। अंत में तो ये हमें ही बेच खाएंगे।





Thursday, February 6, 2014

उत्तर मध्य और उत्तर मुंबई लोकसभा सीट पर मेरी विस्तृत रिपोर्ट 


उत्तर पूर्व और उत्तर पश्चिम मुंबई पर मेरी ख़ास रिपोर्ट 


पालघर और भिवंडी लोकसभा पर मेरी विस्तृत रिपोर्ट 




Thursday, December 5, 2013

भगवान के लिए भगवान मत बनाओ सचिन को।




- सोनम गुप्ता

पिछले दिनों सचिन के आखिरी मैच को लेकर पूरे देश में एक प्रकार का जुनूनी उत्साह था, जो देखते ही बनता था। मुंबई के साथ-साथ पूरा देश सचिन के आखिरी मैच के लिए तैयार हो रहा था। उनकी बिदाई को लेकर रो रहा था। इसी दरमियान कई टीवी चैनलों से लेकर अख़बारों तक व उनके कई फैन्स ने सचिन को भगवान संबोधित किया। उन्हें क्रिकेट का भगवान घोषित कर दिया। इसमें कोई दोराय नहीं की सचिन सचमुच एक अद्भुत खिलाड़ी हैं। क्रिकेट को लेकर उनका संघर्ष और उसके लिए समर्पण सराहनीय हैं। उनकी एकाग्रता, उनके शांत व स्पोर्टसमैन स्पीरिट को, उनके अद्वितीय व्यक्तित्व को जरुर स्कूल में बच्चों को पढ़ाया जाना चाहिए। उनके बेहतरीन प्रदर्शन के लिए देश के सर्वोच्च सम्मानों द्वारा उन्हें जरुर नवाजा जाना चाहिए। भारत रत्न देकर उनकी उपलब्धियों को सम्मानित करना चाहिए।
लेकिन उनके 24 वर्षों के अद्भुत खेल प्रदर्शन के लिए उन्हें भगवान घोषित करना क्या सही है? मेरे ख्याल से बिलकुल नहीं। सचिन तेंदुलकर हमारी ही तरह हाड़-मांस के बने एक मनुष्य हैं। जिन्होंने कड़ी मेहनत और लगन से आज पूरे विश्व में अपने बल्ले का लोहा मनवाया है। उन्हें ईश्वर बनाकर उनके संघर्ष को, मेहनत को हम करिश्माई जादू बताना चाहते हैं।  जिस तरह हमारे पुराणों और कथाओं में चमत्कारिक कृत्तित्व करनेवाले पात्र को हम ईश्वर मानते हैं। उसी तरह सचिन को भगवान कहना उनके मेहनत पर, उनके परिश्रम पर सवाल ऊठाना होगा।
दरसल हमें पत्थर से लेकर पानी तक में भगवान खोजने की आदत-सी पड़ गई हैं।  हमे अपने में ऊर्जा संचारित करने के लिए हमेशा किसी न किसी मूर्ति, आकार की जरुरत पड़ती है। हम या तो राम को पूजते हैं या बूरे कर्मकरनेवाले रावण को जलाते हैं। कर्तव्यनिष्ठ लक्ष्मण, सत्य का दामन थामनेवाले विभीषण को हम ईश्वर के रूप में नहीं मानते। क्योंकि हम हमेशा एक सुपर हीरो या सुपर विलन की तलाश में होते हैं। ग्रे चरित्र यानि व्यवहारिक चरित्र के लिए हमारे जीवन में कोई जगह नहीं होती। हम क्यों नहीं सचिन को भगवान की तरह पूजने के बजाय, उनके तस्वीर की आरती उतारने की बजाय उनके पराक्रम के लिए गौरान्वित महसूस करते? क्यों केवल एक खिलाड़ी की जगह ही रखकर उन्हें सर्वश्रेष्ठ उदहारण की तरह पेश करते? उनकी सफलता का श्रेय उनकी मेहनत को देने की बजाय उसे किसी करिश्मा का नाम क्यों देना चाहते हैं  हम?
अगर सचिन को भगवान कहना है, तो हमे भगवान की एक परिभाषा  गढ़नी होगी। फिर उसमें फिट बैठनेवाले हर व्यक्ति को ईश्वर घोषित करना होगा।
सचिन बेहद जमीन से जुड़े हुए इंसान हैं। वे हमेशा राजनीतिक से लेकर सामाजिक सभी विवादों से बचते हुए आए हैं। उनके फैन जितना उनसे प्रेम करते हैं, वे उतना  ही उनके लिए कृतघ्य होते हैं। मुझे नहीं लगता कि सचिन जो गणपति बाप्पा में बेहद मान्यता रखते हैं, उन्हें उनके बगल में बिठाने की उनके फैन्स की कवायद उन्हें अच्छी लगती होगी।
हमारी आनेवाले पीढ़ी को कौन-से सचिन ज्यादा प्रेरित करेंगे? सचिन भगवान के रूप में या मुंबई की गलियों में एक आम बच्चे की तरह धूप में अपने पसीने बहाकर, अथक लंबी दौड़ लगाकर क्रिकेट जगत में छा जानेवाला सचिन रमेश तेंदुलकर!  सचिन आम में ख़ास जरुर हैं। लेकिन किसी करिश्में या चमत्कार की वजह से नहीं बल्कि अपनी ईच्छाशक्ति, मेहनत और लगन  के चलते हैं। ऊनके परिवार, उनके दोस्तों का साथ उन्हें द सचिन बनाता हैं।
            सचिन एक खिलाड़ी थे, खिलाड़ी हैं और हमेशा खिलाड़ी रहेंगे। गलियों में चौका-छक्का मारनेवाले, हर घुंघराले बालवाले बच्चे हमेशा सचिन के नाम से ही पुकारे जाएंगे। न कि सचिन के भक्त या सचिन के पूजारी।  

Sunday, October 13, 2013

मच्छर नेताजी का डेंगू डंक

https://mail.google.com/mail/images/cleardot.gif- सोनम गुप्ता


भिन्न्न्न…भिन्न्न्न…आज-कल कानों में ये आवाज़ हर समय गूंजती रहती है। डर लगा रहता है कि न जाने इनमें से कौन-सा मच्छर कब काट ले। मलेरिया से डेंगू तक न जाने कौन-सी बीमारी जकड़ ले। पूरे देश में जहां-तहां डेंगू फैल रहा है। आम आदमी की जान ले रहा है। उसे कमजोर बना रहा है या सीधे मौत मुकम्बल कर रहा है। फिल्म इंडस्ट्री के रूमानी निर्देशक यश चोपड़ा की जान भी इन डेंगूवाले मच्छरों ने ही ली थी। चारों ओर इनकी त्राहि-त्राहि मची हुई है। हमारे नेता भी मच्छरों की तरह हैं। कोई मलेरिया देता है तो कोई डेंगू। गंदे पानी की बजाय साफ और शालीन जगहों पर बसनेवाले इन मच्छरों के डंक बहुत विषैले हैं। आम आदमी का खून चूसना इन सफ़ेद पोशाकधारी, अहिंसावादी  मच्छरों का प्रिय काम है। वास्तविक रूप में ये यहां-वहां एक गंदगी से दूसरी गंदगी पर भिनभिनाते रहते हैं। अपना शिकार ढूंढते रहते हैं। मच्छर तो गंदे पानी में पनपते हैं। लेकिन ये जिस जगह पनप जाएं वहां का वातावरण अपने आप गंदा हो जाता है। पहले ज्यादातर मलेरियावाले ही मच्छर पाए जाते थे। लेकिन जब से मलेरिया के इलाज की दवा खोज ली गयी है। तब से इन्होने डेंगू नामक नई बीमारी ईजाद कर ली है। हम पूरे विश्व में डेंगूवाले मच्छरों की संख्या में शीर्ष पर हैं। 
         हमने इन डेंगूवाले मच्छरों पर लगाम कसने के लिए लोकपाल बिल, सांसदों को अपने निजी संपत्ति का पूरा ब्यौरा देने, दागी नेताओं पर गाज गिराने जैसे कई हथकंडे अपनाने की कोशिश की है। फिर भी हम अबतक भ्रस्टाचार उर्फ़ डेंगू नामक इस बीमारी का  कारगर इलाज नहीं ढूंढ पाए हैं। हमने तो कछुवा छाप से लेकर औल आउट तक जला लिया। नार्मल मोड से एक्टिव मोड पर भी आ गए। सड़कों पर आकर धरना, प्रदर्शन भी करने लगे। सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर लाइक और कमेंट करने लगे। फिर भी इन ढीट मच्छरों पर कोई असर नहीं हुआ। ये तो बेबाक होकर अपने डैने पसार उड़ रहें हैं। ये काटने से, खून चूसने से बाज नहीं आए। हमे डेंगू दे दिया। बढ़ती महंगाई में दवा-दारु का खर्चा भी बढ़ा दिया। अब इनके साथ-साथ सफ़ेद कोर्टवाले दूसरे मच्छर हमारा खून चूसने में सक्रिय हो गए है। 
         यहां कुछ सज्जन लोग भी हैं। जो सज्जन के साथ-साथ समझदार और बुद्धिजीवी भी हैं। जो मच्छरों को भगाने का असफल प्रयास न करते हुए ओडोमोस मलकर इनसे बचने लगे। सज्जन को इन दागियों के मुंह लगना शोभा नहीं देता। वो बचने में ही विश्वास रखते हैं। वे न तो दागी मच्छरों को मारकर पापी बनना चाहते और न ही उनसे दुश्मनी मोल लेना चाहते हैं।
वैसे ये नेताओं को मच्छर होने के लिए हमने नहीं चुना था। हम तो इन्हें मधुमक्खी के रूप में देखना चाहते थे। जो साफ़-सुथरी, सुंगंधित फूलों पर भिनभिनाते। हमे मीठे शहद देते। लेकिन ये तो मधुमक्खी बनने की बजाय उसके ही प्रजाति के मच्छर बन गए। दोनों की प्रजाति भले ही एक हो लेकिन दोनों के गुण-धर्म बेहद भिन्न है। पहले जहां-तहां सुंगंधित, रंग-बिरंगे फूल हुआ करते थे और उनपर भिनभिनाते मधुमक्खी। ऊंचे पेड़ों पर मधुमक्खी का छत्ता। लेकिन अब हर जगह गंदे पानी का संचयन होता है। गली-मोहल्ले में नालियां और गटर बहते हैं और उनपर बड़े मच्छर नए लार्वा को  पनपाने का हर भरसक प्रयास करते हैं। अपनी जाति को बढाने का पूरा प्रयास करते हैं। चूंकि इतिहास गवाह है कि 'जातिवाद' वोट बैंक को भरने का सफल काम करता आया है। फिर वहां भी विषैले मच्छरों का जमावड़ा होता। इन सभी सफ़ेद पोश मच्छरों का एक ही धेय होता है, ज्यादा से ज्यादा लोगों का खून चूसकर, अधिकतम लोगों को डेंगू देकर दिल्ली पहुंचना। 
इन डेंगूवाले मच्छरों को भगाने के लिए कई विकल्प ढूढने के बाद महसूस होने लगा है कि ये मच्छर कम होने की बजाय दिन-ब-दिन बढ़ते ही जा रहें हैं। जो कभी मधुमक्खी हुआ करते थे वो भी मच्छर बनने लगे हैं। फूलों का रस चूसने की बजाय उन्हें खून चूसने में ज्यादा मजा आने लगा है।
डेंगूवाले नेताजी 

https://mail.google.com/mail/images/cleardot.gif