Thursday, June 19, 2014

शिवसेना के 48 पायदान पार

शिवसेना के लिए सबसे ज्यादा सफल 48वां साल



मनोहर जेाशी और नारायण राणे शिवसेना के इतिहास में अब तक बने मुख्यमंत्री 


- सोनम गुप्ता

मुंबई। आमतौर पर 48 वर्ष की आयु में व्यक्ति को अधेड़ कहा जाता है। अधेड़ मतलब न तो बूढ़ा और न ही जवान। राजनीति और राजनीतिक दल के मामले में 48 वर्ष की उम्र युवा अवस्था के प्रारंभ का साल होता है। शिवसेना की स्थापना को 19 जून, गुरूवार को 48 साल पूरे हो गए है। सही मायनों में यही वह समय है, जब शिवसेना पूरे जेाश व उत्साह के साथ नौजवान नजर आ रही है। शिवसेना के लहराते हुए नवयौवन का कारण है, 2014 के लोकसभा चुनाव में मिली अपार सफलता। शिवसेना ने महाराष्ट्र में 18 सीटें जीतकर अपने युवा व ताकतवर होने का नजारा दिखा दिया है।
   उत्साह और उमंग का ही नतीजा है कि शिवसेना ने अपने स्थापना दिवस पर पहली बार दो दिवसीय चर्चा-परिचर्चा, विचार-विमर्श और भविष्य व निकट भविष्य में होनेवाले विधानसभा चुनाव की रणनीति बनाने के लिए लगातार दो दिन तक मंथन की प्रक्रिया बांद्रा के रंगशारदा में आयोजित की। 


शिवसेना की चर्चित शिवजी पार्क की दशहरा रैली 


शिवसेना के 4 बड़े बागी - भुजबल, राणे, नाईक और राज 

     सन 2004 से उद्धव ठाकरे ने कार्यकारी अध्यक्ष के नाते शिवसेना की कमान संभाली। इससे पहले शिवसेना और भाजपा गठबंधन में 1995 से लेकर 1999 तक महाराष्ट्र में सत्ता का उपभोग किया। उद्धव ठाकरे के हाथों में शिवसेना की कमान आने के बाद लगातार ऐसा आभास होता रहा कि शिवसेना लगातार कमजोर होती जा रही है। उद्धव ठाकरे के नेतृत्व पर कभी पूर्व मुख्यमंत्री नारायण राणे, तो कभी उद्धव के ही चचेरे भाई राज ठाकरे ने सवाल खड़े किए। इतना ही नहीं उद्धव और शिवसेना के अन्य नेताओं के बीच विवाद इतने बढ़ गए कि जुलाई 2005 में नारायण राणे को पार्टी से बरखास्त कर दिया गया। शिवसेना से निकाले जाने के तुरंत बाद राणे ने शिवसेना के अपने कट्टर समर्थक विधायकों को अपने साथ लिया और कांग्रेस का दामन थाम लिया। कांग्रेस ने राणे को हाथों-हाथ लिया और तुरंत राज्य सरकार में कैबिनेट मंत्री भी बना दिया। 
       उसके बाद 27 नवंबर 2005 को उद्धव ठाकरे के चचेरे भाई राज ठाकरे ने शिवसेना के सभी पदों से इस्तीफा दे दिया। राज को मनाने-समझाने का असपफल प्रयास किया गया। राज को अपना नेता माननेवाले हजारों शिवसैनिकों ने राज ठाकरे के साथ पार्टी छोड़कर जाने का निर्णय ले लिया। राज के साथ न तो शिवसेना का कोई बड़ा पदाधिकारी गया और न ही विधायक व सांसद। लेकिन राज और राणे के शिवसेना छोड़ने से उद्धव ठाकरे की राजनीतिक क्षमता और कुशलता पर प्रश्न चिन्ह लग गया। 
     2007 में मुंबई महानगर पालिका के चुनाव हुए। उद्धव के नेतृृत्व में शिवसेना ने एक बार फिर जीत हासिल की। वहीं 2009 के विधानसभा चुनाव में जब शिवसेना के विधायकों की संख्या घटकर भाजपा के विधायकों से कम हेा गई, तो एक बार पिफर उद्धव ठाकरे के नेतृत्व पर सवाल खड़े हो गए। 17 नवंबर 2012 को शिवसेना प्रमुख बाला साहेब ठाकरे के निधन के बाद से शिवसेना की कमान पूरी तरह उद्धव ठाकरे के हाथों में आ गयी और 2014 के लोकसभा चुनाव में 18 सीट जीतकर अक्षम नेतृत्व कही जानेवाली शिवसेना पिफर से सक्षम नेतृत्व के हाथों में सुरक्षित माने जाने लगी। 
      मार्मिक में छपी एक खबर से हुई शिवसेना की शुरूआत शिवसेना की स्थापना 19 जून 1966 को मराठी साप्ताहिक मार्मिक में एक छोटी-सी खबर छापे जाने के बाद हुई। जब शिवसेना के संस्थापक बाला साहेब ठाकरे ने यह खबर छापी थी। तब उन्होने भी नहीं सोचा था कि मार्मिक में अंदर के पृष्ठ पर छपी किसी खबर का महाराष्ष्ट्र के मराठी मन पर इतना व्यापक असर होगा कि शिवसेना रातो-रात लोकप्रिय हो जाएगी। दक्षिण भारतीयों का अधिकतर सरकारी नौकरियों और बड़े पदों पर कब्जा मराठियों के मन में आक्रोश  पैदा कर चुका था। अन्य राज्यों से आकर मुंबई में नौकरियों पर कब्जा करने का मुद्दा बेरोजगार मराठी युवकों के मन पर छा गया और शिवसेना के भगवा झंडे तले महाराष्ट्र के विकास का स्वप्न मराठी मानुस देखने लगा।
स्थापना के बाद शिवसेना ने ठाणे महानगर पालिका का चुनाव लड़ा और इसमे अपार सफलता मिली। 1971 में शिवसेना ने मुंबई महानगरपालिका पर कब्जा किया और हेमचंद्र गुप्ते पहले शिवसैनिक महापौर बने। जिसके बाद बाला साहेब ठाकरे और उनके कर्मठ साथियों का उत्साह कई गुना बढ़ गया। इसके बाद शिवसेना ने विधानसभा, लोकसभा, मनपा, आदि के कई चुनाव लड़े, लेकिन शिवसेना अपेक्षित सपफलता से दूर ही रही। 


1985 में हुई भाजपा से शिवसेना की युति 

        1985 में भाजपा के नेता प्रमोद महाजन की पहल पर भाजपा का शिवसेना के साथ गठबंधन किया गया। शिवसेना ने भी धीरे-धीरे अपनी प्रांतवादी सोच को बदलकर हिंदुत्व की सोच को अपनाया। यही वजह है कि शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे को  हिंदुहृदय सम्राट कहा जाने लगा। वहीं प्रमोद महाजन भाजपा-शिवसेना युति के शिल्पकार कहलाए। 1990 के विधानसभा चुनाव में शिवसेना और भाजपा को बेहतरीन सपफलता मिली। शिवसेना ने 52 और भाजपा ने 42 सीटों पर जीत हासिल की। विधानसभा में तेज-तर्रार माने जानेवाले ओबीसी नेता छगन भुजबल विपक्ष का नेता बनना चाहते थे। शिवसेना प्रमुख बालासाहेब ठाकरे ने भुजबल को यह पद देने की हामी भी भर दी थी। लेकिन अचानक भुजबल की जगह मनोहर जोशी को विपक्ष का नेता बना दिया गया। इससे छगन भुजबल बेहद आहत हुए। दिसंबर 1991 में नागपुर अधिवेशन के दौरान अचानक छगन भुजबल ने शिवसेना से बगावत कर और अपने साथ 17 विधायक लेकर कांग्रेस में शामिल हो गए। यह शिवसेना के लिए सबसे बड़ा झटका था। विधानसभा में शिवसेना की सीटें भाजपा से कम हो गई और ज्यादा सीटों के बल पर विपक्ष के नेता का पद भाजपा के गोपीनाथ मुंडे के पास चला गया।
 शिवसेना-भाजपा गठबंधन में 1995 में पहली बार सबसे बड़ी सपफलता हासिल हुई। शिवसेना-भाजपा ने निर्दलीयों के साथ मिलकर महाराष्ट्र में सरकार बनाई। मनोहर जोशी शिवसेना के पहले और नारायण राणे शिवसेना के दूसरे मुख्यमंत्री बने। 
        शिवसेना प्रमुख बाला साहेब ठाकरे अपनी धारदार भाषण शैली के लिए पहचाने जाते रहे। शिवसेना प्रमुख ने पहली स्थापना के बाद मुंबई के शिवाजी पार्क पर दशहरा के दिन रैली की। उसके बाद मुंबई में दशहरा का दिन, दादर का शिवाजी पार्क और बाल ठाकरे एक-दूसरे के  पर्याय बन गए। शिवसेना की यह रैली अपने इतिहास में एक मात्र ऐसी रैली है, जो एक नेता, एक दिन के तौर पर विश्वकीर्तिमान बनाए जानेवाली रैली कही जाती है। अब तक के शिवसेना के इतिहास में सिर्फ दो बार किन्ही कारणों से इस रैली का आयोजन नहीं किया गया और 2 से 3 बार इस रैली का समय रात के बजाय दिन में किया गया था। इन अपवादों के अलावा यह रैली शिवाजी पार्क में अनावरत और अबाध चलती रही। ठाकरे की भाषण शैल्य ठाकरी भाषा के तौर पर प्रचलित हुई।

ठाकरे परिवार ने नहीं लड़ा कोई चुनाव

पार्टी के 48 सालों के इतिहास में शिवसेना प्रमुख बालासाहेब ठाकरे और उनका परिवार एकमात्र ऐसा राजनीति परिवार था, जिसने कभी कोई चुनाव नहीं लड़ा और न ही कभी कोई सरकारी पद स्वीकार किया। बालासाहेब ठाकरे को राजनीति में पारस का पत्थर कहा जाने लगा था। उन्होने जिस भी आम आदमी को चहा उस आदमी को नगरसेवक, विधायक, सांसद और मंत्री बना दिया। फिलहाल, बालासाहेब ठाकरे के जाने के बाद उद्धव ठाकरे ने पार्टी की कमान संभाली है। वहीं तीसरी पीढ़ी के आदित्य ठाकरे बालासाहेब ठाकरे के सामने ही युवासेना की कमान संभाल चुके हैं। 


शिवसेना की लोकसभा में स्थिति-
1989 - 1 सीट
1991- 4 सीट
1996- 15 सीट
1998- 6 सीट
1999- 15 सीट
2004- 12 सीट
2009- 11 सीट
2014- 18 सीट

शिवसेना की विधानसभा में स्थिति*- 
1990- 52 सीटें
1995- 73 सीटें
1999- 69 सीटें
2004- 62 सीटें
2009- 45 सीटें
 पार्टी को मान्यता मिलने के बाद से

Monday, April 7, 2014

मामा बोला ऑल द बेस्ट!


- सोनम गुप्ता 


        सुबह-सुबह ट्रेन 15 मिनट लेट चल रही थी। देरी की वजह से ट्रेन में भीड़ देखने लायक हो गयी थी। समय से पहुंचना था इसलिए कुछ भी कर, कैसे भी उस ट्रेन में चढ़ना बहुत जरुरी था। मैं डरते हुए, सहमते हुए, रेल के नियमों का उल्लंघन करते हुए बोगी के फूट ब्रीज पर सवार हो गयी। वाशी पहुंचने तक मेरी स्थिति में कोई सुधार नहीं आया। वाशी ब्रीज आते ही कुछ लोगों ने मुझपर तरस खाकर मुझे बोगी के अंदर यानि खुली हवा से लोगों के पसीनों से गंधित हवा के बीच प्रवेश करने का मौका दिया। मैं जैसे-तैसे एक-एक स्टेशन में खुद को संभालती हुई बोगी के अंदर बैठने की जगह तक पहुंच गयी।  कुर्ला आया और महिला बोगी ने कुछ सास ली। वडाला आने तक बैठने की आधी जगह तो मिल ही गयी। मैंने हाथ में मुड़े हुए किताब को खोला और रिवीजन करना शुरु कर दिया।

      सीएसटी में उतरते ही लगभग दौड़ते हुए टैक्सी स्टैंड तक पहुंची। और टैक्सी को अपने गंतव्य स्थान तक जाने के लिए रुकाने का असफल प्रयास करने लगी। कुछ 3-4 मिनट बीत गए लेकिन कोई टैक्सी केसी कॉलेज जाने के लिए तैयार ही नहीं हुई। मुझे भी कोई बहुत ज्यादा देरी नहीं हो रही थी।  बस समय से पूर्व पहुंचने की इच्छा थी। सुबह-सुबह टैक्सीवालों पर बड़बड़ाने का मन भी नहीं था इसलिए शांति से टैक्सी ढूंढने का कार्य मैं बेहद तल्लीनता के साथ कर रही थी।  तब ही वहां करीब खड़े मामा यानि ट्रैफिक हवलदार ने मुझसे पूछा, 'एग्जाम आहे का?' मैंने आश्चर्य व संदिग्ता दोनों के भाव एक साथ चेहरे पर लाकर जवाब दिया, 'हो।' मेरे हाथ में फ़िलहाल कोई किताब नहीं थी। ट्रेन में ही वह बुक बैग में जा चुकी थी। ऐसे में मामा को कैसे पता लगा कि मेरी परीक्षा है। इतना  मैं सोच ही पायी थी कि उन्होंने मुझसे कहा, "इकडेच थांब। कुठे जाउ नकोस।" इतना कहकर वो आगे चले गए। मैं, उन्हें वहीं खड़ी होकर देखती रही। उन्होंने सड़क के उस पार जाकर एक टैक्सीवाले को हाथ दिखाकर बुलाया। वो टैक्सीवाला अनमना-सा मुंह बनाकर उनके पास अपनी टैक्सी ले आया। उन्होंने टैक्सी को मेरी ओर लाने का इशारा किया और खुद भी कुछ हद तक दौड़ते हुए आए। मुझे टैक्सी में बैठने के लिए कहा और टैक्सीवाले को हिदायत दी कि "इसे केसी कॉलेज के एकदम गेट के पास छोड़ना। इसका एग्जाम है।" टैक्सीवाले ने एकदम अरुचिवाला भाव बनाकर पतले-दुबले मामा को पूरी तरह नजरअंदाज़ करने के लहजे में गियर लगाया।
इतने में आंखों पर चश्मा लागाये मामा ने मुझे टैक्सी में बैठा देखकर इत्मीनान जताते हुए संकोच भरी आवाज़ में कहा, "चांगला कर। आल द बेस्ट।"
       मैं, कुछ सोच या कह पाती उससे पहले टैक्सीवाले ने उदास-सा चेहरा बनाकर एक्सीलरेटर  को दबा दिया। मेरे मुंह से केवल एक ही शब्द मुस्कान के साथ फूटी, "थैंक यू।"


Wednesday, March 26, 2014

मुझपर तुम एक एहसान करो, अपना मत मुझे दान करो।


- सोनम गुप्ता

तुम तो मेरा सम्मान करो,
यूं न मेरे गुण-दोष गिनो,
मुझपर तुम एक एहसान करो,
अपना मत मुझे दान करो।

मैं, एक नेता हूं,
माना तुम्हे कुछ नहीं देता हूं,
चुनाव आने पर
अच्छा अभिनय कर लेता हूं।
वोट मांगने के लिए
तुम्हारे दर पर आया हूं
कुछ रूपए और बोतल भी
अपने साथ मैं, लाया हूं
ना दुत्कारों ऐसे
ना यूं मेरा अपमान करो,
मुझपर तुम एक एहसान करो,
अपना मत मुझे दान करो।


5 साल में पूरे केवल,
एक बार ही
हाथ जोड़कर करता हूं मैं तुमसे याचना
स्वीकार करो
हे कर्ता-धर्ता,
मेरी प्यारी-दुलारी जनता,
मेरी विनम्र प्रार्थना
तेरे ही आर्शीवाद से
संभव है दिल्ली में मेरी सत्ता।

सड़क, पानी, बिजली को ना तुम याद करो,
सिर्फ और सिर्फ विकास की अब बात करो,
मुझपर तुम एक एहसान करो,
अपना मत मुझे दान करो।


गेहूं सड़ते हैं तो सड़ने दो,
तुम मुझको अपना मत दान करो,
आने पर सत्ता
इन्हे गोदामों में रखवा देंगे,
ओले गिरते है तो गिरने दो,
कुछ किसान मरते है, 
तो मरने दो,
दो-चार किसानों का बीमा भी करवा देंगे।

तंग रस्तों से,
गलिच्छ गलियों से,
झेलकर बहुत कष्ट,
द्वार तक तुम्हारे पहुंचा हूं,
ये दीन-दुखियारे, 
अब तुम ही मेरे रखवाले,
2 रोटी अपनी खिलाकर,
मेरे प्रचार में चार-चांद जड़ो,
तुम मेरा यह सविनय निवेदन,
कृप्या अब स्वीकार करो,
मुझपर एक एहसान करो,
अपना मत मुझे दान करो...

Wednesday, March 5, 2014

वोट के बाजार में नेता ब्रांड के फुटकर व्यापारी


-         सोनम गुप्ता


बिक रहे हैं कुछ लोग यहां। जहां पहले बिकते थे केवल टोपी, कुर्ता और कलम। अब बिकने लगे हैं वहां उन टोपियों के नीचे खोपड़ीयां। झक्क सफेद कुर्तों के साथ एक हृष्ट-पुष्ट शरीर। कलम थामें लाल स्याही से हस्ताक्षर करनेवाले हाथ। पहले जिस रेल्वे स्टेशन पर अपना पेट भरने के लिए फुटकर बेचनेवाला 10 रूपए से लेकर 100 रूपये तक की वस्तुएं बेचता था। शर्ट ले लो, सेंट ले लो, केला, अंगूर, संतरा सब कुछ प्रतिबंधित प्लास्टिक की पतली झिल्लीयों में देता था। आज वहीं टाय लगाए, टिप-टॉप फार्मलस् पहने लड़के-लड़कियां कागज और कलम लिए बेच रहे हैं। जी नहीं, कागज और कलम नहीं बेच रहे। वे तो नेताजी को बेच रहे हैं।
 यहां ये देखकर बहुत अच्छा लगा कि अब देश की राजनीति में युवा पीढी बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रही है। फिर चाहे वह बात चुनाव लड़ने की हो या मतदान करने की। देश के युवाओं के इसी रूझान को देखते हुए सभी पार्टियों ने अपने-अपने पार्टी में नए चेहरे, युवा चेहरे, युवा मोर्चा, युवा सेना सबकुछ युवामय कर दिया है। जब पापा को अपने बच्चे को पायलट बनाना होता है, तो बचपन में ही वह उसे खिलौनी की जहाज उड़ाने के लिए दे देता है। यहां भी हर पार्टी के अध्यक्ष ने अपने-अपने सयाने हो गए बेटों को विभिन्न प्रकार के युवा मोर्चो का अध्यक्ष बना दिया है। देश के स्वतंत्र आसमान में अपना नीजि हैलीपैड बेधड़क उड़ाने के लिए अभी से तैयार करना जरूरी है, ना। 
खैर, रेल्वे स्टेशन पर हमारे देश के कुछ आम युवा प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवारों को जनता की बाजार में बेचने का काम कर रहे थे। आइए, आइए फला नेता को प्रधानमंत्री बनाने के लिए हमारी दुकान पर अपना नाम, नंबर लिखवा जाइए। अपने बेशकीमती वोट को हमारे नेताजी के नाम पर बली चढ़ा आइए। अरे हमारे नेताजी फलां नेता से ज्यादा युवा हैं। तो क्या हुआ अगर उनके सारे बाल पक गए हैं। उम्र 50 पार कर चुकी है। सामनेवाले विरोधी भला कौन-से 22 के हैं। हमारे नेताजी बेहद नई सोचवाले, लेटेस्ट टेकनालॉजी का इस्तेमाल करनेवाले हैं। फिर चाहे बात दंगे करवाने की हो या कोई घोटाला छिपाने की हो। अरे...अरे जरा एक मिनट तो यहां देख लो। भई, हमारे नेताजी की दुकान पर आ जाओ। बहुत ही किफायती और टिकाऊ माल है। 5 साल से ज्यादा का वादा है। एक बार वोट दोगे, तो दूजी बार तो कुर्सी हम छोड़ेंगे ही नहीं। आप तो बस खरीद ही लो। बिकाऊ नहीं है हमारे नेताजी। लेकिन हां, दाम तो लगेगा ही। मंदिर में भगवान को भी जब प्रार्थना की मंजूरी के लिए रिश्वत देनी पड़ती है, तो हमारी क्या औकात।
एक सूट-बूटवाले फुटकर व्यापरी ने बताया कि वो किसी विदेशी कंपनी में कार्यरत है और मुफ्त में देश सेवा के लिए अपने इस प्रिय नेता का प्रचार कर रहा है। क्योंकि उसके नेता का नारा ही मुझे लाओ देश बचाओ हैं।  दूसरी ओर से वहां का पुराना फुटकर व्यापारी अपना झोला-झंडा ऊठाकर देश बचाओवालों पर फूट पड़ा। वो जिन नेताजी को बेचने आया था। वे एकदम युवा, इतने की कुछ तो बच्चा भी समझ लेते। गरीबों के रहनुमा, मां के लाडले। अब यहां से भी जोर-शोर से ग्राहकों को पटाने की चिल्लाहट मचने लगी। जनता कन्फूयज हो गई किस को खरीदें। देानों ही झक्क सफेद कुर्ताधारी, युवा, गरीबों की और गरीबी की बात करनेवाले, किसानों का लोहा मानने और मांगनेवाले। यहां मामला गरमाने लगा।
        एक नेता बेचनेवाला दूसरे पर चढ़ने लगा। वह अपने माल को बेहतरीन और टिकाऊ बताता, तो दूसरा अपनेवाले को मार्केट का युवा व सबसे पुराना बै्रंड बताता। मेरा ले। नहीं, नहीं मेरावाला। अरे, उसने घोटाले किए हैं। अरे उसने तो जान लिए हैं। अरे हमारे नेताजी तो युवाराज हैं। वो तो यमराज हैं। अरे, उसका इतिहास कमजोर है। अरे, उसे तो इतिहास पता ही नहीं। अरे, इतिहास छोड़ो भूगोल देखो।  इतने में तीसरा केवल गांधी टोपी पहने अपने नेता का प्रचार करने पहुंचता है। बाकि दोनों को ढोंगी बताकर खुद का सिक्का जमाने लगता हैं। 1 से 3 का शोर अब हाथा-पाई में बदल जाता है। इस हल्ला हो में आम आदमी पगला जाता है। सोचता है, इस दुकान से किसी को भी खरीदू। अंत में तो ये हमें ही बेच खाएंगे।





Thursday, February 6, 2014

उत्तर मध्य और उत्तर मुंबई लोकसभा सीट पर मेरी विस्तृत रिपोर्ट 


उत्तर पूर्व और उत्तर पश्चिम मुंबई पर मेरी ख़ास रिपोर्ट 


पालघर और भिवंडी लोकसभा पर मेरी विस्तृत रिपोर्ट 




Thursday, December 5, 2013

भगवान के लिए भगवान मत बनाओ सचिन को।




- सोनम गुप्ता

पिछले दिनों सचिन के आखिरी मैच को लेकर पूरे देश में एक प्रकार का जुनूनी उत्साह था, जो देखते ही बनता था। मुंबई के साथ-साथ पूरा देश सचिन के आखिरी मैच के लिए तैयार हो रहा था। उनकी बिदाई को लेकर रो रहा था। इसी दरमियान कई टीवी चैनलों से लेकर अख़बारों तक व उनके कई फैन्स ने सचिन को भगवान संबोधित किया। उन्हें क्रिकेट का भगवान घोषित कर दिया। इसमें कोई दोराय नहीं की सचिन सचमुच एक अद्भुत खिलाड़ी हैं। क्रिकेट को लेकर उनका संघर्ष और उसके लिए समर्पण सराहनीय हैं। उनकी एकाग्रता, उनके शांत व स्पोर्टसमैन स्पीरिट को, उनके अद्वितीय व्यक्तित्व को जरुर स्कूल में बच्चों को पढ़ाया जाना चाहिए। उनके बेहतरीन प्रदर्शन के लिए देश के सर्वोच्च सम्मानों द्वारा उन्हें जरुर नवाजा जाना चाहिए। भारत रत्न देकर उनकी उपलब्धियों को सम्मानित करना चाहिए।
लेकिन उनके 24 वर्षों के अद्भुत खेल प्रदर्शन के लिए उन्हें भगवान घोषित करना क्या सही है? मेरे ख्याल से बिलकुल नहीं। सचिन तेंदुलकर हमारी ही तरह हाड़-मांस के बने एक मनुष्य हैं। जिन्होंने कड़ी मेहनत और लगन से आज पूरे विश्व में अपने बल्ले का लोहा मनवाया है। उन्हें ईश्वर बनाकर उनके संघर्ष को, मेहनत को हम करिश्माई जादू बताना चाहते हैं।  जिस तरह हमारे पुराणों और कथाओं में चमत्कारिक कृत्तित्व करनेवाले पात्र को हम ईश्वर मानते हैं। उसी तरह सचिन को भगवान कहना उनके मेहनत पर, उनके परिश्रम पर सवाल ऊठाना होगा।
दरसल हमें पत्थर से लेकर पानी तक में भगवान खोजने की आदत-सी पड़ गई हैं।  हमे अपने में ऊर्जा संचारित करने के लिए हमेशा किसी न किसी मूर्ति, आकार की जरुरत पड़ती है। हम या तो राम को पूजते हैं या बूरे कर्मकरनेवाले रावण को जलाते हैं। कर्तव्यनिष्ठ लक्ष्मण, सत्य का दामन थामनेवाले विभीषण को हम ईश्वर के रूप में नहीं मानते। क्योंकि हम हमेशा एक सुपर हीरो या सुपर विलन की तलाश में होते हैं। ग्रे चरित्र यानि व्यवहारिक चरित्र के लिए हमारे जीवन में कोई जगह नहीं होती। हम क्यों नहीं सचिन को भगवान की तरह पूजने के बजाय, उनके तस्वीर की आरती उतारने की बजाय उनके पराक्रम के लिए गौरान्वित महसूस करते? क्यों केवल एक खिलाड़ी की जगह ही रखकर उन्हें सर्वश्रेष्ठ उदहारण की तरह पेश करते? उनकी सफलता का श्रेय उनकी मेहनत को देने की बजाय उसे किसी करिश्मा का नाम क्यों देना चाहते हैं  हम?
अगर सचिन को भगवान कहना है, तो हमे भगवान की एक परिभाषा  गढ़नी होगी। फिर उसमें फिट बैठनेवाले हर व्यक्ति को ईश्वर घोषित करना होगा।
सचिन बेहद जमीन से जुड़े हुए इंसान हैं। वे हमेशा राजनीतिक से लेकर सामाजिक सभी विवादों से बचते हुए आए हैं। उनके फैन जितना उनसे प्रेम करते हैं, वे उतना  ही उनके लिए कृतघ्य होते हैं। मुझे नहीं लगता कि सचिन जो गणपति बाप्पा में बेहद मान्यता रखते हैं, उन्हें उनके बगल में बिठाने की उनके फैन्स की कवायद उन्हें अच्छी लगती होगी।
हमारी आनेवाले पीढ़ी को कौन-से सचिन ज्यादा प्रेरित करेंगे? सचिन भगवान के रूप में या मुंबई की गलियों में एक आम बच्चे की तरह धूप में अपने पसीने बहाकर, अथक लंबी दौड़ लगाकर क्रिकेट जगत में छा जानेवाला सचिन रमेश तेंदुलकर!  सचिन आम में ख़ास जरुर हैं। लेकिन किसी करिश्में या चमत्कार की वजह से नहीं बल्कि अपनी ईच्छाशक्ति, मेहनत और लगन  के चलते हैं। ऊनके परिवार, उनके दोस्तों का साथ उन्हें द सचिन बनाता हैं।
            सचिन एक खिलाड़ी थे, खिलाड़ी हैं और हमेशा खिलाड़ी रहेंगे। गलियों में चौका-छक्का मारनेवाले, हर घुंघराले बालवाले बच्चे हमेशा सचिन के नाम से ही पुकारे जाएंगे। न कि सचिन के भक्त या सचिन के पूजारी।  

Sunday, October 13, 2013

मच्छर नेताजी का डेंगू डंक

https://mail.google.com/mail/images/cleardot.gif- सोनम गुप्ता


भिन्न्न्नभिन्न्न्नआज-कल कानों में ये आवाज़ हर समय गूंजती रहती है। डर लगा रहता है कि न जाने इनमें से कौन-सा मच्छर कब काट ले। मलेरिया से डेंगू तक न जाने कौन-सी बीमारी जकड़ ले। पूरे देश में जहां-तहां डेंगू फैल रहा है। आम आदमी की जान ले रहा है। उसे कमजोर बना रहा है या सीधे मौत मुकम्बल कर रहा है। फिल्म इंडस्ट्री के रूमानी निर्देशक यश चोपड़ा की जान भी इन डेंगूवाले मच्छरों ने ही ली थी। चारों ओर इनकी त्राहि-त्राहि मची हुई है। हमारे नेता भी मच्छरों की तरह हैं। कोई मलेरिया देता है तो कोई डेंगू। गंदे पानी की बजाय साफ और शालीन जगहों पर बसनेवाले इन मच्छरों के डंक बहुत विषैले हैं। आम आदमी का खून चूसना इन सफ़ेद पोशाकधारी, अहिंसावादी  मच्छरों का प्रिय काम है। वास्तविक रूप में ये यहां-वहां एक गंदगी से दूसरी गंदगी पर भिनभिनाते रहते हैं। अपना शिकार ढूंढते रहते हैं। मच्छर तो गंदे पानी में पनपते हैं। लेकिन ये जिस जगह पनप जाएं वहां का वातावरण अपने आप गंदा हो जाता है। पहले ज्यादातर मलेरियावाले ही मच्छर पाए जाते थे। लेकिन जब से मलेरिया के इलाज की दवा खोज ली गयी है। तब से इन्होने डेंगू नामक नई बीमारी ईजाद कर ली है। हम पूरे विश्व में डेंगूवाले मच्छरों की संख्या में शीर्ष पर हैं। 
         हमने इन डेंगूवाले मच्छरों पर लगाम कसने के लिए लोकपाल बिल, सांसदों को अपने निजी संपत्ति का पूरा ब्यौरा देने, दागी नेताओं पर गाज गिराने जैसे कई हथकंडे अपनाने की कोशिश की है। फिर भी हम अबतक भ्रस्टाचार उर्फ़ डेंगू नामक इस बीमारी का  कारगर इलाज नहीं ढूंढ पाए हैं। हमने तो कछुवा छाप से लेकर औल आउट तक जला लिया। नार्मल मोड से एक्टिव मोड पर भी आ गए। सड़कों पर आकर धरना, प्रदर्शन भी करने लगे। सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर लाइक और कमेंट करने लगे। फिर भी इन ढीट मच्छरों पर कोई असर नहीं हुआ। ये तो बेबाक होकर अपने डैने पसार उड़ रहें हैं। ये काटने से, खून चूसने से बाज नहीं आए। हमे डेंगू दे दिया। बढ़ती महंगाई में दवा-दारु का खर्चा भी बढ़ा दिया। अब इनके साथ-साथ सफ़ेद कोर्टवाले दूसरे मच्छर हमारा खून चूसने में सक्रिय हो गए है। 
         यहां कुछ सज्जन लोग भी हैं। जो सज्जन के साथ-साथ समझदार और बुद्धिजीवी भी हैं। जो मच्छरों को भगाने का असफल प्रयास न करते हुए ओडोमोस मलकर इनसे बचने लगे। सज्जन को इन दागियों के मुंह लगना शोभा नहीं देता। वो बचने में ही विश्वास रखते हैं। वे न तो दागी मच्छरों को मारकर पापी बनना चाहते और न ही उनसे दुश्मनी मोल लेना चाहते हैं।
वैसे ये नेताओं को मच्छर होने के लिए हमने नहीं चुना था। हम तो इन्हें मधुमक्खी के रूप में देखना चाहते थे। जो साफ़-सुथरी, सुंगंधित फूलों पर भिनभिनाते। हमे मीठे शहद देते। लेकिन ये तो मधुमक्खी बनने की बजाय उसके ही प्रजाति के मच्छर बन गए। दोनों की प्रजाति भले ही एक हो लेकिन दोनों के गुण-धर्म बेहद भिन्न है। पहले जहां-तहां सुंगंधित, रंग-बिरंगे फूल हुआ करते थे और उनपर भिनभिनाते मधुमक्खी। ऊंचे पेड़ों पर मधुमक्खी का छत्ता। लेकिन अब हर जगह गंदे पानी का संचयन होता है। गली-मोहल्ले में नालियां और गटर बहते हैं और उनपर बड़े मच्छर नए लार्वा को  पनपाने का हर भरसक प्रयास करते हैं। अपनी जाति को बढाने का पूरा प्रयास करते हैं। चूंकि इतिहास गवाह है कि 'जातिवाद' वोट बैंक को भरने का सफल काम करता आया है। फिर वहां भी विषैले मच्छरों का जमावड़ा होता। इन सभी सफ़ेद पोश मच्छरों का एक ही धेय होता है, ज्यादा से ज्यादा लोगों का खून चूसकर, अधिकतम लोगों को डेंगू देकर दिल्ली पहुंचना। 
इन डेंगूवाले मच्छरों को भगाने के लिए कई विकल्प ढूढने के बाद महसूस होने लगा है कि ये मच्छर कम होने की बजाय दिन-ब-दिन बढ़ते ही जा रहें हैं। जो कभी मधुमक्खी हुआ करते थे वो भी मच्छर बनने लगे हैं। फूलों का रस चूसने की बजाय उन्हें खून चूसने में ज्यादा मजा आने लगा है।
डेंगूवाले नेताजी 

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Friday, September 27, 2013

सोचा न था!

इतनी बेरूखी तुमसे हासिल होगी,
सोचा न था,
जिसके बाहों में जिंदगी गुजारने की ख्वाइश रही
अबोला होगा उनसे भी कभी
सोचा न था,
ऐसा अविश्वास तुम्हे हमपर होगा
तार-तार खींच उठेंगे
सोचा न था,
मुझसे एक पल की दूरी तुम्हे मंजूर न थी
उम्र भर के लिए अकेला छोड़ोगे
सोचा न था,
जिन आंखों में मेरे बसते थे तुम सुब-हो-शाम
उनमें ही आंसू भर दोगे
सोचा न था,
हर अलफ़ाज़ मेरे मिश्री-सी लगती थी तुम्हे
ये भी कभी अप्रिय लगेंगे
सोचा न था,
दर्द में भी जिसका नाम तुम्हारी सांसों में था
वो नाम धूमिल होगा कभी
सोचा न था,
मुझे 'जान' कहनेवाला 
इस कदर मेरी जान तिल-तिल लेगा कभी
सोचा न था!  
        - सोनम गुप्ता 

Thursday, September 26, 2013

आडवाणी की पत्र लेखन-कला यानि खंबा नोचना

आखिरकार महीनों तक अपनी टीआरपी मोदी के नाम पर बढ़ाने के बाद, करोड़ों रुपए के कॉन्ट्रैक्ट साइन करवाने के बाद, देश को धर्म के नाम पर बांटने के बाद नमो को अअनुमानित, बेहद अचंभित तौर से पीएम पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया गया। आडवाणी बाबा को ये बात हजम नहीं हो रही। शायद उनका हाजमा ख़राब हो गया है। दरअसल वो कई वर्षों से पीएम की कुर्सी का सपना खा रहे थे। मेरा मतलब है देख रहे थे। सो एक ही चीज लंबे समय तक ज्यादा मात्रा में खाने से कभी-कभी हाजमा बिगड़ जाता है। उनके जोड़ीदार अटल बिहारी वाजपेई के प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठने के बाद से तो उनका सपना उछाल मारने लगा था। उसके बाद वे अलग-अलग डिपार्टमेंट के मंत्री तो बन गए। लेकिन प्रधानमंत्री नहीं बन पाए। 
         क्लास के मोनिटर से वो टीचर तो बन गए लेकिन पूरे स्कूल का प्रिंसिपल नहीं बन पाए। और आज जब उनकी टीम में से किसी एक को प्रिंसिपल पद के दावेदारी के लिए आगे करने की बारी आयी तो वे सबसे सीनियर होने के नाते अपने कंधे उचकाते हुए आगे आए। लेकिन ही उन्हें और  ही उनके ऊचकते हुए कन्धों पर किसी ने ध्यान दिया। वे महफ़िल में उत्साहित होकर, सज-धज कर खड़े थे, कि मंच पर किसी और का नाम अद्यक्ष महोदय ने घोषित कर दिया। तब उन्हें सहसा गहरा धक्का लगा। जब हमे कोई पुरस्कार मिलने की संभावना होती है, तो उसके मिलने पर हम चिडचिडा जाते हैं। जिसे मिला उसकी योग्यता को दाएं-बाएं कर नापने लगते हैं। और यहां तो प्रतियोगी को अपनी जीत की संभावना नहीं बल्कि पूरा-पूरा विश्वास था। लेकिन उनेक देखते ही देखते उनके ही कक्षा का उनका ही एक स्टूडेंट उनसे आगे निकल गया। और सीधे प्रिंसिपल के पद का दावेदार हो गया। भाई! तिलमिलाहट तो होनी ही थी। पहले अपना साथी और अब अपना स्टूडेंट। कायदे से देखा जाए तो नंबर बाबाजी का ही था। लेकिन आज-कल राजनीति में युवा वर्ग पर ख़ास ध्यान देने का ट्रेंड चला है। ऐसे में नमो पार्टी में सबसे होनहार युवा दावेदार हैं। ऐसा नहीं कि बाबाजी होनहार नहीं या युवा नहीं। बाबाजी भी युवा हैं, लेकिन थोड़े पूराने युवा।

          खैर, प्रिंसिपल की रेस से बाहर निकलने की वजह से बाबाजी नाराज हो गए हैं। अगली बार पता नहीं उन्हें मौका मिले मिले। अब जाते-जाते कम-से-कम 1 बार तो प्रधान कुर्सी पर बैठ जाते। उन्होंने सीधे अपने स्टूडेंट को कुछ बोलते हुए टीचर्स असोसिएशन के अद्यक्ष को पत्र लिखकर अपनी रुसवाई जाहिर की। बाबाजी 86 साल की उम्र में अपने जवां सपनो को पूरा करने के लिए देश के लंबे-लंबे सड़कों पर कई दफा रथ लेकर घुमे। फिर भी उन्हें किसी ने राजा नहीं माना। बाबाजी को कौन बताए कि अब देश की जनता रथ पर नहीं बल्कि दंगे और 'मिरेकल्स' पसंद करती है। उन्हें जरुरत पड़ने पर तलवार निकलनेवाले राजा चाहिए कि बयान देनेवाले राजा। उन्हें वाणी नहीं मोदी चहिए। 
      बाबाजी शुरू से ही नमो के नाम से असंतुष्ट थे। वे वरिष्ठ हैं। वे अनुभवी और समझदार हैं। इसलिए बाकि सदस्यों ने सोचा देर-सबेर वे अपने शिष्य को अपना ही लेंगे। लेकिन गुरूजी की महत्त्वकांक्षा शिष्य की उन्नति की ख़ुशी से बड़ी निकली।  वे अपने तत्तकालीन पदों से इस्तीफा देने से लेकर पत्र-लेखन, जैसे तमाम खंबे नोचने लगे।  वे असली लड़ाकू हैं। अपने प्रतिद्वंदी को कुर्सी से खींच लाने में भी उन्हें कोई गुरेज नहीं होगा। हमे बाबाजी से एक चीज़ तो सीखनी ही चाहिए वो है स्टैंड लेना। वो टिके हुए है, लगतार अपने स्टैंड पर। बिलकुल अटलअचल।  वे अब भी उम्मीद में हैं। और अब भी लड़ने से पीछे नहीं हटेंगे। देश के लिए नहीं भाई! पीएम की कुर्सी के लिए।  हो सकता है वे एकदम आखिरी में भावनात्मक चाल चले, और पीएम की कुर्सी के दावेदारी का उम्मीदवार बनने को अपनी आखिरी इच्छा घोषित कर दें।   
  
- सोनम गुप्ता