Saturday, May 25, 2013

कर्मशीलता से मिलता ईश्वर



      

      हमारी संकीर्ण सोच और समझ के चलते ही हमारे देश में फर्जी धर्म गुरुओं ने जन्म लिया है। जो अपने आप को ईश्वर समझते है और लोभ और ऐश्वर्य से दूर रहने की सलाह देनेवालें यह गुरु खुद ऐ.सी. में रहकर, विदेश घूमते है। यहाँ मेरा मकसद किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुचाना नहीं है। लेकिन अगर सचमुच यह पण्डे-पुजारी इश्वर के दूत होते तो, आज ऑनलाइन पूजा, ग्रहशांति, राशिशान्ति जैसे धर्म को शर्मशार करनेवाली गतिविधयां नहीं हो रही होती। 
      कुछ साल पहले इलाहाबाद में मैं संगम देखने पहुंची तो वहां पण्डे-पुजारियों ने इस कदर घेर लिया मानो कोई गुड की ढेलियां मक्खियों के बीच गिर गयी हो और यह पण्डे पुजारी मक्खियों की तरह उसे चूसने के लिए भिन -भीना रहे हो। कोई कहता मैं मात्र 2000 में पूरा पिंड दान करवा दूंगा, 1000 दे दो आपके सभी ग्रहों को ठिकाने लगा दूंगा तो कुछ उनमें से जो अभी इस व्यापार में नवसिखियाँ है वह 500 में ही हमारे पूर्वजों का बेडा पार करवाने को तैयार बैठे थे। इन सब से जैसे-तैसे बाहर निकल जब नाव में बैठकर संगम देखने पहुंची। तब मेरी नजर उन धर्म भीरुओं पर गयी जो हजारों रुपैये देकर वहीँ 10 रुपयें की नारियल जिसे सुबह से 10 लोगों ने हाथ में पकड़ कर अपने पूर्वजों के मोक्ष की प्राथना की उसी से बेहद संतुष्टता के साथ अपने घर परिवार की शांति ईश्वर से मना रहे थे। यह तथाकथित पूजा यही ख़त्म नहीं होती। अब बारी है बड़े खर्चे की। यह पुजारी लोग आपको अंत में मन में किसी प्रकार के दान करने का संकल्प लेने के लिए कहेंगे। जिसकी सूची में घूम-फिर कर इनके ही फायदे की बात होगी और सबसे मजेदार बात यह होती है कि आपके वचन लेने के बाद यह अपनी एक और सुविधा सामने रखते है। जैसे किसी मॉल में ज्यादा रुपयों की खरीददारी करो  तो उसे घर तक पहुचाने की सुविधा भी अंत में दी जाती है। आप जो भी दान करना चाहे, चाहे वो पंडितों को भोज हो या गाय माता का दान..या कुछ और उसके लिए आप एक बड़ी राशी इन्हें दे देंगे। तो यह उसे आपकी इच्छा अनुसार तथाकथित रूप में दान कर देंगे। जिस से आपको यहां -वहां  भटकने की चिंता भी नहीं होगी। फिर चाहे उन पैसों से रात को यह शराब पी कर मस्त मिले या चरस-गांजे की चुस्की लगा रहे हो। हम सज्जन व्यक्ति तो सभ्यता और परम्परा के चादर को इस कदर ओढ़ रखे है कि अपने मृत पूर्वजों को शांति देने के लिए हजारों रुपैयें दे कर बिना किसी सवाल-जवाब के चलते बनते है। फिर यह उन पैसों से क्या करे उस से हमे क्या! हमारी जेब से तो धर्म के नाम पर पैसा निकला है और सज्जन व्यक्ति ज्यादा सवाल-जवाब नहीं करते। अगर आप इन पंडितों के झांसे में नहीं आते और इनके द्वारा दी जाने वाली किसी भी सुविधा का इस्तेमाल नहीं करते तो यह आपको खरी-खोटी सुनाने में भी देरी नहीं करते। यहीं इनकी नैतिकता का प्रमाण मिल जाता है। ईश्वर  के करीब ले जाने का दावा करनेवाले यह लोग इस व्यापार के लिए बखूबी प्रशिक्षण लेते है। इन्हें पता होता है कि किस तरह के इन्सान को किस प्रकार अपने झांसे में लेना है। कैसे उन्हें भावनाओं के जाल में उलझाना है। अगर यह धर्म-गुरु इतने ही पवित्र है तो मोक्ष दिलाने का दावा करनेवाले यह लोग पैसो के मोह जाल में क्यों अटके है?
        रामायण में सच्चे संत, महात्मा को कपास कहा गया है। उसके चरित्र को श्वेत और पाक बताया गया है। संत वही होता है जो अपने स्वार्थ को भूल कर दूसरों के दुखों को दूर करने का हर भरसक प्रयास करे। लेकिन आज-कल ढूंढ़ने से भी ऐसे साधू-संत मिलना मुश्किल है। हमे अपने धर्म को बोझ की तरह नहीं बल्कि प्रेम की तरह पालना चाहिए। आस्था के दामन को ढोंग से मैला करने की बजाय दिल में सच्ची भावनाएं, व्यवहार में नैतिकता, व्यक्तित्व में सहजता अपनाना चाहिए। कोई जन्म से संत या पंडित नहीं होता। आपका आचरण, आपके कर्म आपको पंडित बनाते है। जाति से पंडित बने कंठीधारी तो केवल धन कमाने के लिए अपना पांडित्य जताते है। ईश्वर की पूजा फूल-माला और मंदिरों में घंटों लाइन लगाने से नहीं होती। उनकी सेवा के लिए उनके कथनों, उनके संदेशों को हमे आत्मसात करना चाहिए।  अपने बच्चों को कर्म को ईश्वर कहनेवाली गीता का ज्ञान दे। दिन में भले ही हम 2 बार धुप बत्ती न जलाये। लेकिन अगर एक बार हम रामायण और गीता के कुछ पन्ने पढ़ उन्हें अपने जीवन में उतारे तो शायद इस से बड़ी पूजा दूजी न होगी। मेरा मानना है, कि ईश्वर  मंदिरों में नहीं बल्कि सकारात्मक विचारों, ढृढ़ संकल्पों, मानवता और कर्मशीलता से मिलते है।
                                        -सोनम प्र. गुप्ता 

Thursday, May 23, 2013

जेट पर सवार हमरे अखिलेश भैय्या

जेट पर सवार हमरे अखिलेश भैय्या 


अखिलेश भैय्या वाशी तक आए। यह खबर पहले ही मालूम होती तो अम्मा (दादीजी) से कहकर चबैना मंगवा लेती। पिछले साल शादी में गए थे, तब जो दुपट्टा घर में छूट गया वह भी साथ आ जाता। सोचा था भैय्या अपनी साईकिल पर सवार होकर आएंगे। इतना सामान कैसे लाते। लेकिन भैय्या तो सीधे जेट प्लेन में बैठकर घर के बगल में आ पहुंचे। पहले से खबर होती तो मेरे छोटे-मोटे कितने ही सामान घर से सुरक्षित जेट की सवारी करते हुए आ जाते। भीतर न सही ऊपर छत पर या टॉयलेट के पास तो रखवा ही सकते थे। ट्रेन की टिकिट के लिए हो रही मारा-मारी के बीच कब से कितने ही महत्त्वपूर्ण सामान उत्तर प्रदेश से मुंबई नहीं पहुंच पाए हैं। भैय्याजी को अपने मुंबई आने की खबर का मेरे गांव में भी ढिंढोरा पिटवाना चाहिए था। जरूरतमंद लोग इसी बहाने बंबई तक खुद पहुंचने या अपने परिजनों तक कुछ पहुंचाने की कोशिश तो करते। कम-से-कम 77 वर्षीय मेरे छज्जू चाचा की मुंबई घूमने की 60 साल पुरानी अभिलाषा तो पूरी हो जाती। ट्रेन में जो गर्दी है उसमें तो डर लगा रहता है कि कहीं महाराष्ट्र की सीमा में पहुंचने से पहले ही छज्जू चाचा कहीं परलोक की यात्रा में शामिल न हो जाएं। एम्. ए. पास रमेश पिछले फरवरी महीने से ही रेल के चालू डब्बे में बैठकर यहां मुंबई आना चाहता है, ताकि यहां के किसी फुटपाथ पर भाजी बेचने का ठेला लगा सके। अखिलेश भैय्या ने बताया होता तो वह भी प्लेन के किसी पंखे-वंखे से लटककर यहां पहुंच जाता। 26-28 घंटे लटकने से तो दो-ढाई घंटे लटकना ज्यादा सुविधाजनक होता। मैं समझ सकती हूं, कि जेट में जगह की कमी है। मुंबई में भी जगह की कमी है। इसीलिए तो उत्तर प्रदेश भवन मुंबई के बजाय बगल के नवी मुंबई में बनाया गया है। खैर, इसके उदघाटन में फलाना-ढिमका नेता का आना जरुरी था। हमारे यूपी के सभी लोग जानते हैं कि पानी में रहकर मगरमच्छ से बैर नहीं किया जाता। अपने अखिलेश भैय्या तो ठहरे डेढ़ सयाने गुड़ खाएं और गुलगुलों से परहेज करें, ये यूपी की मिट्टी का अपमान होता। अखिलेश भैय्या मिट्टी के माधो नहीं हैं। इसलिए भैय्या मिट्टी की परम्परा का सम्मान करते हैं और सबको ये सीख भी देते हैं कि घर में रहकर घरवालों से परहेज नहीं किया जाता। वो घर चाहे अपना घर हो, सरकारी घर हो, राजधानी का घर हो, लखनऊ का घर हो, मुंबई का घर हो या फिर प्राइवेट बोईंग विमान ही क्यों न हो। असली मजा तो अपने सब के साथ आता है। पहलवान कम मास्साब पप्पा ने सब सिखाया है। चच्चा हो, चच्ची हो, भैय्या हो, भाभी हो, डिम्प्पी हो, शिम्प्पी हो, भैय्याजी सबको संभालने का जतन करते हैं। दामाद में बड़ा दम होता है। पप्पा की सीख काम आई। जिसको भी ला सकते थे भैय्या जेट में सबको समेट लाए। रिश्तेदार तो रिश्तेदार सब बड़े और जानेमाने पत्रकारों को भी समेट लाए। पत्रकारों को छोड़ आते तो 2014 के चुनाव के दौरान अपनी साईकिल 8 कॉलम के किसी कोने में ढूंढ़ने पर भी नहीं मिलती। मेरे चाचाजी ने कहा काश! हम भी किसी बड़े अखबार के पत्रकार होते। इसी बहाने जेट प्लेन का सफ़र तो कर लेते। मैंने भी सोचा काश! चाचाजी किसी नामी अखबार के पत्रकार होते तो इसी बहाने मेरे गरीब खाने में अखिलेश भैय्या के चरण तो पड़ते। लेकिन फिर भी हिम्मत करके मैं उनसे मिलने और उन्हें अपने घर बुलाने जरुर जाउंगी। आखिरकार, राहुल भैय्या की तरह उनका भी चुनावी टारगेट युवा पीढ़ी है। सोच रही हूं कि अखिलेश भैय्या के उत्तर प्रदेश भवन के कार्यक्रम में पहुंचकर एकाध लेपटॉप मैं भी लपक लूं। मैं भी युवा हूं और ग्रैजुएट भी हूं। एक लेपटॉप पर तो अपना हक़ भी बनता है। हम तो संतोषी किस्म के इंसान हैं। लेपटॉप नहीं तो ना सही। अगर साईकिल ही नसीब हो जाए तो हम उसी से काम चला लेंगे। भागते-भागते कुछ मिले न मिले साईकिल तो मिल ही सकती है।  
                            -सोनम प्रगुप्ता 

Wednesday, April 17, 2013

'हम' रहो...

'हम' रहो...















तुम में मैं हूं,
मुझमें तुम हो,
तुम और मैं नहीं,
तुम और मैं 'हम',
तुम हो,
संग हो,
हर पल हो,
करीब हो,
चाहते हो,
मानते हो,
दुलारते हो,
दुत्कारते हो,
इसलिए हम है,
तुम रहो,
साथ चलो,
बांट लो,
हर क्षण मेरे,
भीतर बसो,
डांट लो,
चाहो तो,
मार लो,
फिर सीने से अपने,
लगा लो,
साथ रहो,
संग चलो,
हर पल,
एहसास में बसो,
माफ़ करो,
सजा दो,
संभाल लो,
बुला लो,
लेकिन,
अपने से कभी,
न दूर करो,
तुम मेरे हो,
मेरे रहो,
मैं तुम्हारी हूं,
सीने से लगा रखो,
सुबह हो,
शाम हो,
कल हो,
आज हो,
वक़्त हो,
बेवक्त हो,
तुम रहो,
संग चलो,
तुम नहीं मैं नहीं,
'हम' रहो ...
                              -सोनम प्र. गुप्ता 

Sunday, April 7, 2013

हिंदी साहित्य का इतिहास


                                     
       हिंदी साहित्य के आरम्भ का प्रश्न हिंदी भाषा के आरंभ से जुडा हुआ है। इस भाषा का विकास एक जन भाषा के रूप में हुआ है। कोई भी जन भाषा अपने प्रवाह की अक्षुणता में सदा एकरूप नहीं रह सकती। स्थान और काल के भेद से उसमें रूप भेद भी स्वतः उत्पन्न हो जाता है। अतः भाषा के रूप-भेद को भुलाकर तात्त्विक परिवर्तन के आधार पर ही एक भाषा के अंत और दूसरी भाषा के आरंभ का इतिहास स्वीकार करना अधिक समीचीन प्रतीत होता है।  
      काल विभाजन का नामकरण साहित्य के इतिहास की महत्त्वपूर्ण समस्याएं हैं। इनके आधार सामान्यतः इस प्रकार माने गए है:
1. ऐतिहासिक काल-क्रम के अनुसार: आदिकाल, मध्यकाल, संक्रांति-काल, आधुनिक काल, आदि।
2. शासक और उसके शासन-काल के अनुसार: एलिजाबेथ-युग, विक्टोरिया-युग, मराठा-काल आदि।
3. लोकनायक और उसके प्रभाव-काल के अनुसार: चैतन्य-काल(बांग्ला), गाँधी-युग(गुजराती) आदि।
4. साहित्य नेता और उसकी प्रभाव-परिधि के अनुसार: रविन्द्र-युग, भारतेंदु युग, आदि। 
5. राष्ट्रीय, सामाजिक अथवा सांस्कृतिक घटना या आन्दोलन के आधार पर: भक्ति काल, पुनर्जागरण काल, सुधार काल, युधोत्तर काल, स्वातंत्र्योतर काल आदि।
6. साहित्यिक प्रवृत्ति के नाम पर: रोमानी युग, रीतिकाल, छायावाद-युग आदि।

आचार्य शुक्ल ने जॉर्ज ग्रियर्सन और मिश्र बंधुओं से कुछ संकेत ग्रहण कर हिंदी साहित्य के इतिहास को अपनी तर्कपुष्टि व्याख्या देकर चार कालों में विभक्त कर उनका नामकरण किया।  
प्रारंभिक साहित्यकारों ने साहित्य को चार काल खंडों में विभाजित किया:
1. आदिकाल या वीरगाथा काल: संवत 1050 से 1375 तक।
2. पूर्व मध्य काल या भक्तिकाल: संवत 1375 से 1700 तक।
3. उत्तर मध्य काल या रीतिकाल: संवत 1700 से 1900 तक।
4. आधुनिक काल या गद्य का विकास: संवत 1900 से वर्तमान तक।


आदिकाल या वीरगाथा काल
इस समय विशेष में संवत 1050 से संवत 1375 तक का काल खंड आता है। इसके प्रारंभिक डेढ़ सौ वर्ष तो प्राय: सामान्य रचनाओं के ही रहे, किंतु मुगलों के आक्रमण ने रचनाओं की भावभूमि में परिवर्तन कराया। एक नयी प्रवृत्ति उभर कर आई जिसमें चारण कवियों का बोल-बाला रहा। ये रचनाकार नीति और श्रृंगार प्रधान रचनायें करते और अपने राजा की शौर्य गाथाओं का बखान करते। इस काल खंड को इसी कारण "वीरगाथा काल" कहा गया।
इसका मूल आधार रासो नामक प्रबंध परम्परा है। यहां अपभ्रंश या प्राकृताभास हिंदी में भी रचनाएं उपलब्ध है। इस समय में प्राचीन भाषा-परम्परा और बोलचाल की भाषा का प्रचुर साहित्य एक साथ मौजूद है। प्राकृत सवांद की भाषा न रही और अपभ्रंश-साहित्य का आविर्भाव हुआ। यदि धर्म विषयक रचनाओं को छोड़ दिया जाए तो सामान्य रूप से साहित्यक रचनाकारों और रचना-संग्रहकर्ताओं के सांकेतिक उल्लेख-क्रम में इतिहासकारों ने हेमचंद्र, सोमप्रभ सूरि, जैनाचार्य मेरुतुंग, विद्याधर और शागर्धर का उल्लेख किया है।
मुगलों के आक्रमण का इस काल के इतिहास में विशेष महत्त्व है। इनसे यद्यपि पश्चिम प्रान्त के लोग अधिक प्रभावित हुए। लेकिन हिंदी साहित्य के अम्युदय का यही काल है। इस काल में रचित वीरगाथाओं के दो रूप मिलते है। प्रबंध काव्य का साहित्यिक रूप और वीर गीत। इस काल की प्रमुख रचनाएं हैं- 'वीसलदेव रासो', 'पृथ्वीराज रासो' और 'खुमान रासो'। इस काल के प्रमुख रचनाकार हैं- चंदबरदाई, मधुकर कवी, भट्ट केदार, जगनिक और श्रीधर। साथ ही खुसरो और विद्यापति का रचनाकाल भी वीरगाथा काल के अंतिम चरण में प्रारंभ माना गया है। खुसरो पश्चिम की बोली और मौखिक परम्परा में जीवित गद्य के संवाहक हैं तो पूरब से विद्यापति एक  अलग ही रचना-रंग लेकर आए थे।
   5000 छंदों के विशाल काव्य-ग्रन्थ 'खुमान रासो' में से एक छंद उदारणार्थ:
पिउ चितौड़ न आविऊ, सावण पहिली तीज।
जोवै बात बिरहिणी खिण-खिण अणवै खीज।।
संदेसो पिण साहिबा, पाछो फिरिय न देह।
पंछी घाल्या पिंज्जरे, छुटण रो संदेह।।
       उपर्युक्त छंद में वीर रस के साथ-साथ श्रृंगार की धारा भी आदि से अंत तक चली है। इसमें दोहा, सवैया, कवित्त आदि छंद प्रयुक्त हुए हैं। इसकी भाषा राजस्थानी हिंदी है। 
अधिकांश साहित्य इतिहासकारों की मान्यता है कि 'वीरगाथा काल' का समय महाराज हम्मीर के समय तक ही है। इसके बाद मुग़ल साम्राज्य जड़े जमाता चला गया। हिन्दू राजाओं में इसके बाद न तो परस्पर युद्ध अधिक हुए और न वे मुगलों से ही लड़ सके। इसके बाद वीर-काव्य न लिखे गए हों, ऐसा नहीं है। लेकिन साहित्य में सोच की धारा का प्रमुख प्रवाह ना बना रहा। यही परिवर्तन बना साहित्य के इतिहास के दूसरे चरण का कारण।

 पूर्व मध्यकाल या भक्ति काल
       पूर्व मध्यकाल को भक्ति काल भी कहते है। इसका तात्पर्य उस काल से है जिसमें मुखयत: भगवत धर्म के प्रचार तथा प्रसार के परिणामस्वरूप भक्ति-आन्दोलन का सूत्रपात्र हुआ था और उसकी लोकोन्मुखी प्रव्रत्ति के कारण धीरे-धीरे लोक-प्रचलित भाषाएं भक्ति-भावना की अभिव्यक्ति का माध्यम बनती गयीं और कालांतर में भक्तिविषयक विपुल साहित्य की बाढ़-सी आ गयी। इस काल में सगुण और निर्गुण भक्ति पर आधारित दो धाराएं विद्यमान रहीं। सगुण धारा में राम भक्ति व् कृष्ण भक्ति, दो शाखाएं मानी गयी। रामभक्ति शाखा में राम की महिमा का वर्णन करनेवाले कवियों की गणना होती है। ये रामानंद की शिष्य परम्परा में आए। इस शाखा के प्रमुख कवियों में गोस्वामी तुलसीदास सर्वश्रेष्ठ माने गए हैं। उन्हें हिंदी के प्राय: सभी आलोचकों ने सर्वांगपूर्ण काव्य कुशलता संपन्न कवि के रूप में आदर दिया है। इस शाखा के अन्य प्रमुख कवि हैं- स्वामी अग्रदास, नाभादास, प्राण चंद्र चौहान, हृदयराम आदि। तुलसी कृत "रामचरितमानस" को इस शाखा का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ माना ही गया। साथ ही यह लोकप्रियता की शिखर पर भी हैं। 
        निर्गुण भक्ति का मूल तत्त्व है- निर्गुण-सगुन से पूरे अनादि, अनन्त, अनाम, अजात ब्रह्म का नाम-जप। इस भक्ति पद्धति का तृतीय मूल तत्त्व है-प्रेम के माध्यम से कर्मकांड की अनपेक्षित दुरुहताओं को दूर करना। प्रेममयी भक्ति का अनुभव व्यक्त करते हुए कबीर ने लिखा है: 
           हरि रस पीया जानिए, जे कबहूं न जाय खुमार।
मैमंता घूमत फिरै, नाहीं तन की सार।।
     कृष्ण भक्ति शाखा के दार्शनिक आचार्य के रूप में वल्लभाचार्य प्रसिद्ध हैं। इस शाखा के प्रमुख कवि है सूरदास। 'सूरसागर' इनका सर्वप्रमुख ग्रन्थ हैं। अन्य उल्लेखनीय कवियों में कृष्णदास, परमानंददास, कुंभनदास, चतुर्भुजदास, छीतस्वामी, गोविंदस्वामी, हितहरिवंश, गदाधर भट्ट, मीराबाई, हरिदास, रसखान आदि की गणना होती है। निर्गुण धारा में भी सगुण धारा की भांति दो उप धाराएं या शाखाएं हैं- पहली ज्ञानमार्गी और दूसरी प्रेममार्गी। ज्ञानमर्गियों में कबीर सर्वप्रमुख हैं। अन्य उल्लेखनीय रचनाकारों में रैदास, गुरुनानक, धर्मदास, सुन्दरदास, दादूदयाल, मलकूदास और अक्षर की गणना की जाती है।
       सगुण भक्ति पर आधारित गोस्वामी तुलसीदास के राम भक्ति पर लिखा एक पद उदारणार्थ:
निगम अगम, साहब सुगम राम सांचिली चाह।
अंबु असन अवलोकियत सुलभ सबहि जंग माह।।

उत्तर मध्यकाल या रीतिकाल 
आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इस काल को रचना पद्धिति के अनुसार रीतिकाल कहा है। उत्तर मध्यकाल या रीतिकाल तक आते हुए हिंदी-काव्य पर्याप्त प्रौढ़ हो चुका था। रस-निरूपण तो प्रारंभ हो ही चुका था, श्रृंगार व् अलंकर-ग्रंथ भी रचे जा चुके थे। इस युग के काव्य को मुख्यत: पांच प्रवृतिसूचक वर्गों में विभाजित किया जा सकता है। वे 5 वर्ग क्रमश: है- रीतिकाव्य, रीतिमुक्त काव्य, भक्तिकाव्य, नीतिकाव्य और वीरकाव्य। इस समय विशेष के सर्वप्रमुख कवि केशवदास हुए। इन्होने काव्य के सभी अंगों का शास्त्रीय पद्धति से अपनी रचनाओं में निरूपण किया। यह काव्य में प्रधान स्थान अलंकार को दिया करते थे। इन्हें काव्यांग का निरूपण करनेवाली पुरानी दशा से परिचित कराने वाला भी माना जाता है। यह दशा भामह और उद्दभट के समय विद्यमान थी। चिंतामणि के काव्य विवेक से ऐसा निरंतर प्रवाह बना जिससे रीति ग्रंथों की परम्परा तैयार हुई। इस काल खंड के प्रमुख कवि माने गए- बिहारी लाल, बेनी, जसवंत सिंह, मंडन, भूषण, मतिराम, कुलपति मिश्र, नेवाज, देव, भिखारी दास, घनानंद, पद्माकर, गिरधर ठाकुर और गिरधर दास।
          रीतिकाल के सर्वश्रेठ कवि बिहारी की भाषा प्रांजल, प्रौढ़, मधुर और सरस है। निम्नलिखित उदहारण उनके गुणों का एक प्रमाण है:
अंग-अंग नग जगमगति, दीप सिखा-सी देह।
दिया बुझाए हूं रहै, बड़ो उजेरो गेह।।
रस सिंगार मंजन किये, कंजन भंजन दैन।
अंजन रंजन हूं बिना, खंजन गंजन नैन।।
केसरि के सरि क्यों सके, चम्पक कितक अनूप।
गात रूप लखि जात दुरि, जातरूप को रूप।।
    उपर्युक्त दोहों से स्पस्ट है कि भाव, अनुभूति और चेतना को बिहारी किस प्रकार मार्मिक शब्दों और प्रभावशाली बिम्बों में प्रकट करने की क्षमता रखते हैं। 

आधुनिक काल 
             इस काल में हिंदी साहित्य में गद्य का विकास हुआ। इसका आधार तो संवत 400 के आस-पास ब्रज भाषा का गद्य अवश्य था। लेकिन उसका स्वरुप परिभार्जित नहीं था। 'नासिकेतोपाख्यान' सुव्यवस्थित भाषा की दृष्टि से संवत 1760 के उपरांत प्रारंभिक उल्लेखनीय कृति मानी गयी। खड़ी बोली के सहज स्वीकार के कारण हिंदी गद्य को एक नवीन दिशा प्राप्त हुई। अनुमान है कि इसके पार्शव में खुसरो, कबीर और गंगा की प्रारंभिक परम्परा आधार रही होगी। इस काल विशेष में भारत में रीतिकाल का समापन तो हो ही रहा था। भारत में शासन पर अधिपत्य जमा लेनेवाली अंग्रेजी हुकूमत के समक्ष दो तरह की भाषाएं प्रस्तुत थी। पहली सामान्य खड़ी बोली और दूसरी मुस्लिमों द्वारा भाषा को प्रद्दत एक दरबारी रूपवाली उर्दू।
            संक्षेप में, आधुनिक काल के उपविभाजन का प्रारूप निम्नलिखित ढंग से प्रस्तुत किया जा सकता है:
      1. पुनर्जागरण-काल (भारतेंदु काल) 
      2. जागरण-सुधार-काल (द्वेवेदी काल)
      3. छायावाद-काल 
      4. छायावादोत्तर-काल:
        (क) प्रगति-प्रयोग-काल 
        (ख) नवलेखन-काल 
               'रानी केतकी की कहानी' के इस रचनाकाल में इंशाअल्लाह खां ही नहीं; लल्लू लाल, मुंशी संदासुखलाल, सदल मिश्र भी प्रमुख रचनाकारों में थे। और तो और इसाई धर्म के प्रचारकों तक ने हिंदी को ही माध्यम बनाया। ब्रह्म समाज के संस्थापक राजा राम मोहन राय भी इस काल में सक्रीय रहे। 'उद्दंत मार्तंड' का प्रकाशन तो इससे भी पहले प्रारंभ हो चुका था। इसके उपरांत राज लक्षमण सिंह और राजा शिवप्रसाद सिंह के काल में गद्य विकास की ओर प्रस्थान किया। वस्तुतः इस समय भाषा व् रचना के दोहरे मोर्चे पर एक साथ सक्रियता दिखा सकनेवालों की कमी महसूस की जा रही थी। ऐसे में भारतेंदु ने अग्रदूत की भूमिका निभाई। इस काल के अन्य प्रमुख रचनाकार रहे- बालकृष्ण भट्ट, प्रताप नारायण मिश्र, आदि। निबंधों व् नाटकों की ओर रचनकार भारतेंदु के कारण ही आकृष्ट हुए। लाला श्रीनिवासदास ने 'परीक्षा गुरु' लिखकर हिंदी में मौलिक उपन्यास लेखन का प्रारंभ किया। इस काल में अनेक पत्र-पत्रिकाएं प्रकाशित होने लगीं। जिन लेखकों ने इनमें महत्त्वपूर्ण योगदान किया, उनमें उल्लेखनीय है- राधाचरण गोस्वामी, बदरीनारायण चौधरी, ठाकुर जगमोहन सिंह, अम्बिकादत्त व्यास, काशीनाथ खत्री, कार्तिक प्रसाद खत्री, आदि। भारतेंदु ने तो 'भारत दुर्दशा ', 'वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति', 'चंद्रावली', 'अंधेर नगरी', जैसे नाटक लिखकर ही नहीं, अनेक नाटकों के अनुवाद करके भी साहित्य की श्रीवृद्धि की।
भारतेंदु का यह काल अनेक राजनितिक, धार्मिक और सांस्कृतिक आन्दोलनों के कारण परिवर्तन काल भी कहा जा सकता है। यही वह समय था जब भारत में राष्ट्रीय चेतना का उद्दभव हुआ। इस काल की अधिकांश रचनाओं में इसीलिए नवजागरण का सन्देश मौजूद था। ब्रज भाषा के गहरे संस्कारों के कारण ही इस काल के अधिकांश रचनाकार खड़ी बोली में रचना कर्म कर पाए। भारतेंदु और प्रेमधन की कतिप्रय कृतियां जरुर खड़ी बोली में हैं। 1850 से 1900 तक का यह काल आधुनिक हिंदी साहित्य का आधार बना। 
महावीर प्रसाद द्वेवेदी द्वारा सम्पादित 'सरस्वती' से इस काल का दूसरा चरण प्रारंभ हुआ। कथाकारों में देवकीनंदन खत्री, किशोरी लाल गोस्वामी, लज्जाराम मेहता प्रमुख उपन्यासकार रहे। 'चंद्रकांता संतति' की ख्याति ऐसी हुई कि पाठकों ने इन्हें पढने के लिए हिंदी सीखी।
कहानीकारों में मास्टर भगवानदास, रामचंद्र शुक्ल, बंग महिला, गिरजादत्त बाजपेई के बाद जयशंकर प्रसाद, जी. पी. श्रीवास्तव, कौशिक राधिकारमण प्रसाद सिंह, गुलेरी, चतुरसेन शास्त्री प्रमुख रहे। इस काल में कथालेखन प्रारंभ करने वाले प्रेमचंद्र ही आगे चलकर हिंदी कहानी की असल और दीर्घ जीवी भूमि तैयार कर सके।
इस काल में जिन निबंधकारों ने भाषा का विकास अपनी तरह किया, उनमें महावीर प्रसाद द्वेवेदि, बालमुकुंद गुप्त, माधवप्रसाद मिश्र, श्यामसुंदर दास और गुलेरी प्रमुख हैं। 
यदि द्वितीय चरण की कविता के प्रारंभ की चर्चा की जाए तो यह श्रीधर पाठक के प्रक्रितिविर्णन से प्रारंभ होकर हरिऔध, मैथिलीशरण गुप्त, रामनरेश त्रिपाठी की रचनाओं तक विस्तृत है। तीसरे चरण में कहानी, उपन्यास, निबंध, नाटक, आलोचना और कविता ने नयी उड़ान भरी।
'गबन', 'रंगभूमि', 'गढ़कुंडार', 'चित्रलेखा', 'मां', ‘ह्रदय की प्यास', 'कंकाल', 'तितली', 'तपोभूमि', 'सुनीता', 'बुधवा' की बेटी', जैसे उपन्यास कालजयी धरोहर बने। कहानी में चंडीप्रसाद 'हृदयेश', प्रेमचंद, प्रसाद, सुदर्शन, जैनेंद्र, विनोद शंकर व्यास, उग्र आदि की रचानों ने साहित्य को समृद्ध किया।
नाटक में प्रसाद, हरिकृष्ण प्रेमी के साथ ही गोविंद वल्लभ पन्त, गोविन्द दास, उदय शंकर भट्ट और अश्क सरीखे रचनाकारों ने अभिवृद्धि की। रूपक एवं एकांकी भी लिखे गए। सुदर्शन, रामकुमार वर्मा, भगवती चरण वर्मा, अश्क व् भुवनेश्वर का संयुक्त संग्रह प्रकाशित हुआ।
         
काव्य में विकास
हिंदी काव्य में छायावाद का उदय एक नई प्रवृत्ति के रूप में हुआ। राष्ट्रित भाषा की जाग्रति के साथ ही वैयक्तिक प्रेम-भाव व् सौन्दर्य-चित्रण के लिए ही नहीं, रहस्य भावना और अध्यात्मिक प्रेम के लिए भी यह कालखंड महत्वपूर्ण रहा। प्रसाद, पंत, निराला, महादेवी के अतिरिक्त नवीन, अंचल, दिनकर और सोहनलाल द्वेवेदी भी सक्रीय रहे।
इसके बाद प्रयोगवाद व् नई कविता का समय प्रारंभ हुआ। सन 1950 के बाद का यह समय 'तारसप्तक' के जरिए समझा जा सकता है। अज्ञेय द्वारा सम्पादित इस प्रतिनिधि संग्रह के साथ स्वयं संपादक, गिरिजाकुमार माथुर, भारत भूषण अग्रवाल, मुक्तिबोध, प्रभाकर माचवे, रामविलास शर्मा, नेमिचंद जैन के अतिरिक्त जो अन्य महत्त्वपूर्ण कवि सक्रीय थे, उनमें शमशेर, नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, त्रिलोचन, शील, सुमन व् ठाकुर प्रसाद सिंह की चर्चा की जानी चाहिए। उसके दूसरे चरण में जिन रचनाकारों ने अपनी छाप छोड़ी, वे हैं-भारती, नरेश मेहता, सर्वेशवर, रघुवीर सहाय, जगदीश गुप्त, कुंवर नारायण व् लक्ष्मीकांत वर्मा।
नई कविता के विकास के साथ ही जो अगली पीढ़ी तैयार हुई उसमें धूमिल, केदारनाथ सिंह, विष्णुचंद्र शर्मा, अशोक वाजपेई, जगदीश चतुर्वेदी, जुगड़ी देवताले, विष्णु खरे, प्रयाग शुक्ल सरीखे रचनाकार सामने आए। जिन अन्य कवियों ने इनके बाद अपनी कविता के नए मिजाज से जगह बनाई, वे हैं- मानबहादुर सिंह, मंगलेश डबराल, इब्बार रब्बी, आलोक धन्वा, सोमदत्त, राजेश जोशी, अरुण कमल, उदय प्रकाश प्रभृति।
प्रयोगवादी कवि अज्ञेय की कविता उदारणार्थ:
दुःख सब को मांजता है
और
चाहे स्वयं सब को मुक्ति देना वह न जाने, किन्तु
जिनको मांजता है
उन्हें यह सीख देता है कि सब को मुक्त रखें।
गीतों के प्रति, आधुनिकता के दबाव के चलते रुझान कुछ कम जरुर हुआ, लेकिन नीरज, वीरेन्द्र मिश्र, रमेश रंजक, नईम, कुंवर बेचैन, योगेंद्र दत्त शर्मा, रामकुमार कृषक, शलभ श्रीराम सिंह जैसे रचनाकारों ने छंद में नई बात कह कर इस विधा को बनाए रखा। छाया वाद युग में हास्य-व्यंग्यात्मक काव्य की भी प्रभूत परिमाण में रचना की गयी। छायावाद-युग के व्यंगकारों में पाण्डेय बेचन शर्मा 'उग्र' का अलग ही स्थान है। इसी युग के हास्य-व्यंगकार थे-कृष्णदेवप्रसाद गौड़ जिन्हें 'बेढब बनारसी' के नाम से पहचाना जाता है। इनकी काव्य-शैली का एक उदाहरण:
 बाद मरने के मेरे कब्र पर आलू बोना 
  हश्र तक यह मेरे ब्रेकफास्ट के सामा होंगे,
 उम्र सारी तो कटी घिसते कलम ए बेढब          
आख़िरी वक्त में क्या ख़ाक पहलवा होंगे।
इधर जिन युवा कवियों ने अलग पहचान बनाई हैं, उनमें बद्रीनारायण, कात्यायनी, संजय चतुर्वेदी, निर्मल पुतुल, विमल कुमार, गगन गिल, अनिल जनविजय, लीलाधर मंडलोई और स्वप्निल श्रीवास्तव उल्लेखनीय हैं। अब एकदम नए कवियों की एक पूरी पांत तैयार हो रही है।
नाटक में प्रसाद के 'ध्रुवस्वामिनी' के बाद 1951 में जगदीश चंद्र माथुर 'कोणार्क' आया। इसके सात वर्ष बाद मोहन राकेश का 'आषाढ का एक दिन' आया। अन्य नाटककारों में धर्मवीर भारती, लक्ष्मी नारायण लाल और नरेश मेहता प्रमुख रहे। बाद में सत्येन्द्र शरत, मुद्राराक्षस, मणि मधुकर, रमेश बक्षी, नरेन्द्र कोहली, कुसुम कुमार आदि उल्लेखनीय नाटककार रहे।
ऐतिहासिक उपन्यासों से उदासीन रचनाकारों के समय में चतुर सेन शास्त्री का 'वैशाली की नगरवधू' वृन्दावनलाल वर्मा का 'मृगनयनी' व् यशपाल का 'दिव्या' ही अपवाद रहे। बदलते मिजाज के उपन्यास लेखन में जैनेंद्र, अज्ञेय, इलाचंद्र जोशी, उदयशंकर भट्ट, अमृतलाल नागर, यशपाल, भगवतीचरण वर्मा, रांगेय राघव, राहुल सांकृत्यायन, नागार्जुन, रेणु, अश्क, भीष्म साहनी, राजेंद्र यादव, नरेश मेहता, भैरवप्रसाद गुप्त, हजारी प्रसाद द्वेवेदी, शिवप्रसाद सिंह की पीढी के रचनारत रहते ही एक और पीढी के उपन्यासकारों की आ गई। इनमें श्रीलाल शुक्ल, शैलेश मटियानी, शिवानी, भिक्खू प्रमुख हैं। मन्नू भंडारी, विवेक राय, नरेंद्र कोहली, मनोहर श्याम जोशी, मैत्रेयी पुष्प, रविन्द्र वर्मा, पंकज बिष्ट, मृदुला गर्ग, विनोद कुमार शुक्ल, राही सेठ, चित्रा मुदगल, संजीव, नासिरा शर्मा, चंद्रकांता, वीरेंद्र जैन और क्षितिज शर्मा ने इस विधा को आगे बढाया।
कथानक, भाषा और शिल्प की दृष्टि से कुछ प्रमुख उपन्यास हैं-'झूठा सच', 'मैला आँचल', 'बलचनमा', 'उखड़े हुए लोग', 'सुनीता', 'छोटे-छोटे महायुद्ध', 'लेकिन दरवाजा', 'आवां', 'दीवार में एक खिड़की रहती थी', 'चाक', 'सूखा बरगद', 'डूब' और 'उकाव'।
प्रेमचंद के बाद कहानी ने तेजी से विकास किया और नई कहानी, अकहानी, सहज कहानी, समांतर कहानी सचेतन कहानी, सक्रिय कहानी व् जनवादी कहानी के दौरों के बाद संप्रति हिंदी कहानी एक खुले आसमान के साथ नजर आ रही है।
कमलेश्वर, मोहन राकेश, निर्मल वर्मा, विष्णु प्रभाकर, कृष्णा सोबती, परसाई, शिव प्रसाद सिंह, अमरकांत, शेखर जोशी, भीष्म साहनी, राजेन्द्र यादव, उषा प्रियंवदा, रेणु, निर्गुण, हृदयेश, शैलेश मटियानी, कामतानाथ, हिमांशु जोशी, रमाकांत ने अपनी पहचान अलग-अलग कारणों से बनायी। बाद के दौर में जो कथाकार स्वतंत्र रूप से अपनी पहचान बना सके, वे हैं- ज्ञानरंजन, गिरिराज किशोर, विजय मोहन सिंह, रमेश उपाध्याय, गोविंद मिश्र, असगर वजाहत, स्वयं प्रकाश, संजीव, उदय प्रकाश, शिवमूर्ति, बलराम, महेश दर्पण, अखिलेश, प्रियवंद, अब्दुल विस्मिल्लाह और सुरेश उनियाल। इनके बाद दो दशकों के बीच एक नई पीढ़ी उभर कर आई है जिनमें नवीन नैथानी, योगेंद्र आहूजा, संजय कुंदन, अरविन्द कुमार सिंह, सूरजपाल चौहान, नीलिमा सिन्हा, मनोज रुपड़ा, गौरीनाथ, हरि भट नागर, कृष्ण बिहारी, कमल कुमार व् उमाशंकर चौधरी सहित अनेक लेखक-लेखिकाएं सक्रिय  हैं।
कथा में लघुकथा एक तेजी से विकसित विधा है। इस विधा को समय-समय पर जिन रचनाकारों ने विकसित किया, उनमें रावी, विष्णु प्रभाकर, राजेंद्र यादव, रमेश बतरा, असगर बजाहत, उदय प्रकाश, चित्र मुदगल, महेश दर्पण, विष्णु नागर, अवधेश कुमार और मुकेश वर्मा आदि उल्लेखनीय हैं।
संस्मरणों में विष्णु प्रभाकर, हरिशंकर परसाई, कमलेश्वर, कांतिकुमार जैन, रविन्द्र कालिया, विष्णु चंद शर्मा, काशीनाथ सिंह, मनोहर श्याम जोशी और पी. सी. जोशी का उल्लेख जरुरी है। इसके बाद की पीढ़ी ने भी अब इस विधा का महत्त्व समझ है। इधर यात्रा वृतांत का भी खूब दौर रहा है। इनमें निर्मल वर्मा, हिमांशु जोशी, कृष्णदत्त पालीकाल, विश्वनाथ प्रसाद तिवारी के यात्रावृत्त पठनीय रहे हैं।
साक्षात्कार का जो स्तर श्रीकांत शर्मा, मनोहर श्याम जोशी और पदमा सचदेव ने बताया था, उसे कुछ हद तक सुरेंद्र तिवारी, भारत यायाकर, पुष्प भारती और महावीर अग्रवाल ने आगे बढाया है।
सामयिक विषयों पर गंभीर लेखन के लिए राज किशोर, अशोक वाजपेयी, सुधीश पचौरी, गिरिराज किशोर, प्रभा दीक्षित, पंकज बिष्ट और प्रभु जोशी उल्लेखनीय हैं।
    अपभ्रंश, ब्रज, अवधि, उर्दू, फारसी, इत्यादि से शब्द जुड़ते-जुड़ते हिंदी भाषा और उसका साहित्य  प्रगति करता गया। आज हिंदी साहित्य में अंग्रेजी के शब्दों का चलन खूब बढ़ा है। आम लोगो को साहित्य से जोड़ने के लिए उसका सरल और सहज होना बेहद जरुरी है। स्वतंत्रता के बाद राजभाषा के रूप में प्रतिष्टित हो जाने पर हिंदी के ज्ञान-साहित्य का योजनाबद्ध विकास हुआ है। हिंदी साहित्य के इतिहास पर गौर करे तो उसमें कई प्रकार के वाद शामिल है। पूराने लेखों और पदों को पढने से कहीं न कहीं उस समय का आभास जरुर होता है। किसी न किसी प्रकार की एक विचारधारा रेखांकित होती है।  लेकिन आज का साहित्य व्यक्ति केन्द्रित हो गया है। लेखक, कवि, रचयिता की रचनाएं उन्ही के चारों ओर फिर रही है। आज के साहित्य का समाज, सरकार, देश, आदि से कोई सरोकार नहीं नजर आता। केवल लेखक और उसके अपने अनुभव और उसकी बातें जो ज्यादातर वास्तविकता से अछूते-से लगते है। वर्तमान हिंदी साहित्य में कहीं समाज और देश की  यथास्थिति प्रतिबिंबित नहीं हो रही। इस युग में भी ऐसे कुछ नाम है जो अपवाद है। लेकिन उनकी संख्या भी उंगली पर गिन सकने जितनी ही है। 
                                                                -सोनम प्र. गुप्ता 

Ref: Manoram Year book 2012,
       बुक: हिंदी साहित्य का इतिहास 

                                     

Sunday, March 24, 2013

महिलाओं को मुख्यधारा से अलग करने की साजिश




       लेडिस स्पेशल ट्रेन, लेडिस स्पेशल बस, लेडिस स्पेशल बैंक और ना जाने क्या-क्या लेडिस स्पेशल हो गया हैं। देश में हर जगह महिलाओं के लिए हर चीज़ की स्पेशल एडिशन बन रही है। हर क्षेत्र में, हर गली-मोहल्ले में लेडिस स्पेशल की एक सुविधा जरुर होगी। ऐसी किस्म-किस्म की स्पेशल सुविधाओं के बीच महिलाएं अपने को स्पेशल महसूस करने लगती हैं। वे समझ ही नहीं पा रही कि ऐसी स्पेशल सुविधाओं के सहारे उन्हें मुख्य धारा से दर किनार किया जा रहा है। सबकुछ अलग से देकर वे चाहते है कि हम उतने में ही खुश हो जाए और इस पुरुषप्रधान समाज के बीच दखल न दे। अगर देर हो रही हो तो बगल में खड़ी महिला विशेष बस में चढने की बजाय आप तुरंत निकल रही बस में चढ जाय तो सभी पुरुष आपको हिकारत की नजर से देखेंगे। साथ ही उस बस में न चढ़कर इसमें सवार होने के लिए ताना भी मारेंगे। बिजली, पानी और सड़क की ही तरह अब महिलाएं भी सत्ताधारियों के लिए एक अहम् चुनावी मुद्दा बन गयी है। उन्हें हमारी शक्ति और सामर्थ्य का अंदाज़ा है। वो तो हम महिलाएं है जो थोड़े में खुश रहना पसंद करती है। मुख्यधारा से हट कर भी संतुष्ट हो रही है। महिलाओं की जमात जो कि दुनियां की आधी आबादी है-कहीं उनके लिए स्पेशल योजनाएं सिर्फ वोट बैंक भरने का एक हथकंडा तो नहीं? दलित, अनुसूचित जातियों और शारीरिक व् मानसिक रूप से असमर्थ लोगों के लिए आरक्षण की राजनीति का इस्तेमाल किया जाता है। कही वहीँ तरीका महिलाओं पर तो नहीं आजमाया जा रहा? जहां हमारे संविधान में स्त्री-पुरुष समानता की बात कही गयी हो। वहीं आरक्षण के दायरे में महिलाओं को बांधकर राजनितिक पार्टियां क्या साबित करना चाहती है? क्या यह उन्हें मुख्यधारा से अलग करने की साजिश नहीं है? 


Sunday, March 17, 2013

नहीं ला पाया अम्मा और बाबू को

छोटा-सा घर हो,
आंगन में तुलसी,
और छत पर हिंडोला हो,
कमरे में सजी हो,
बेंत की आराम कुर्सी,
जिस पर बाबू बैठकर,
पढ़ रहे हो,
सुबह का अखबार,
अम्मा काढ रही हो,
मेज पोस,
बीबी सजा रही हो मुहार,
बच्चे गार्डन में खेले,
दादा के संग घुमे,
दादी की कहानियों में,
बीते उनकी हर रात,
साथ रहे सब,
मिलजुलकर,
दिन दुगनी-रात चौगुनी,
बढे हमारे बीच का प्यार,
पर मुंबई शहर में,
नहीं मिला,
दो कमरे का कमरा,
आँगन की जगह,
मिली दो फुट की गैलरी,
जहां जूते-चप्पल का बना स्टैंड,
बेंत की आराम कुर्सी,
गद्देदार, महंगे,
सोफों के बीच,
(पत्नी को,)
स्टेटस की नहीं लगी,
ओल्ड फैशन की बनकर,
एक दिन,
कबाड़ में बिक गयी,
सुबह का अखबार,
अलंकार हीन मुहार पर,
बिखरा पड़ा रहा,
सजा था मेज पर,
मखमल का विदेशी कंचुक,
गार्डन में नौकरानी के साथ,
बच्चे जाते रोज शाम,
बचपन में किया था वादा,
और यौवन के पायदान पर,
रखते हुए पहला कदम,
सजाया था सपना,
मन के भीतरी एक कोने में,
जब जाऊंगा शहर,
बन जाऊंगा कमाऊ पूत,
और अपने पैसों से,
बनाऊंगा मकान,
ले जाऊंगा संग,
अम्मा-बाबू को,
रखूँगा साथ उन्हें अपने,
नहीं बनूंगा नालायक बेटा,
२० सालों में,
खूब कमाया पैसा और नाम,
लेकिन फिर भी,
अपने मकान पर,
नहीं ला पाया अम्मा और बाबू को,
नहीं बना पाया,
अपने सपनों का वह नन्हा घर ...


Thursday, January 17, 2013

अभिव्यक्ति की स्वंत्रता किसे: मालिको को या नौकरों को?

  भारतीय संविधान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार मूल अधिकारों में सम्मिलित है। इसकी 19, 20, 21 तथा 22 क्रमांक की धाराएँ नागरिकों को बोलने एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सहित 6 प्रकार की स्वतंत्रता प्रदान करतीं हैं। इस अनुसार भारत में सभी नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वंत्रता है। प्रेस को भी अभिव्यक्ति की स्वंत्रता दी गयी है। लेकिन यह अभिव्यक्ति की स्वंत्रता पूर्ण रूप से निर्बाधित न होकर युक्तियुक्त बंधनों से युक्त है। मेरा मानना है कि प्रेस में नौकर की अभिव्यक्ति प्रतिबंधित होती है। वह चाहकर भी अपने विचारो को स्वतंत्रतापूर्वक पूर्णरूप से नहीं रख सकता। यदि वह अपने विचार रखता भी है, तो जरुरी नहीं कि  उसकी अभिव्यक्ति को अपनाया जाए। ऊपरी दर्जे पर बैठे लोग यदि उसकी बात से असहमति जताते है। तो वही उसकी अभिव्यक्ति की आज़ादी पर प्रतिबन्ध  लग जाता है। उसे मालिको के निर्देशों और नियमों के अनुरूप कार्य करना होता है। ऐसे में उसकी अभियव्यक्ति की स्वंत्रता मालिको और कंपनी के नियमों में सिमटी होती है। यदि वो उनके विरुद्ध जाकर अपने विचारों को अभिव्यक्त करने की सोचता है। तो संभवत: उसे अपने नौकरी से हाथ धोना पड़ सकता है।
      वहीँ दूसरी ओर  अगर मालिको की बात की जाय तो उन्हें भी पूर्ण रूप से अभिव्यक्ति की आज़ादी नहीं होती। मालिक अकेला अपने आप में कुछ नहीं होता। उस पर भी बाजारीकरण का दबाव होता है। बाजार में लाभ को देखते हुए वह अपने फैसले और अपनी अभिव्यक्तियों को निरंतर बदलता रहता है। भूमंडलीकरण के इस दौर में विचार, मत और दृष्टिकोण सभी कुछ बाजारवाद का शिकार हो गए है। मुनाफे को देखते हुए विचारों का उलट-फेर किया जा रहा है। पहले अख़बार लोगो के मार्गदर्शन और वास्तविकता का बोध करवाने के लिए निकाले जाते थे। लेकिन आज-कल समाचार को समझ सकने में असमर्थ लोग भी अपने-अपने अख़बार छपवा रहे है। अब अख़बार या पत्रिका निकालना सामाजिक उत्तरदायित्व नहीं रहा। यह व्यवसाय बन गया है। बड़े-बड़े उद्योगपति विज्ञापन से अधिक से अधिक मुनाफा कमाने के लिए समाचार पत्रिका निकलवाते है। ऐसे में इन अख़बारों में अभिव्यक्ति के महत्त्व को नगण्य मानने में कोई हर्ज़ नहीं है। जहां मालिको को सिर्फ अपने मुनाफे और व्यापार से मतलब हो वहां लोगो के हित और नौकरों की अभिव्यक्ति का ख्याल रखने की उम्मीद करना मूर्खता होगी। कभी मालिक नौकर के किसी विचार से सहमत भी हो तो जरुरी नहीं की वह उन्हें अपने अख़बार में स्थान दे। वह बाज़ार और विज्ञापनदाताओं के हितों को नजर में रखते हुए ही ख़बरों का चयन करता है। दुर्भाग्य की बात है, कि पाठक से ज्यादा अब विज्ञापनदाताओं के हितो का ख्याल रखा जाता है। पहले पाठक ईश्वर होता था लेकिन अब विज्ञापनदाता सबकुछ हो गया है। 
     वर्तमान स्थिति को देखते हुए यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है, कि अभिव्यक्ति की स्वंत्रता न नौकरों को है और न ही पूर्ण रूप से मालिको को। यह सब कुछ अब बाज़ार द्वारा संचलित हो गया है। हाँ, अगर तुलना की जाय तो मालिकों को नौकरों से अधिक स्वंत्रता जरुर मिलती है।
                                                                           -सोनम प्र. गुप्ता 

Monday, December 31, 2012

क्यों न आते तुम हर उस शाम


तुम साथ क्यों नहीं थे,
उस शाम क्यों नहीं थे,
उन दरिंदों ने,
मेरी आत्मा को,
निर्ममता से मार दिया,
तड़पी मैं,
चीखी मैं,
चिल्लाते हुए,
बचने की कोशिश भी की,
लेकिन हार ही गयी,
तुम्हारी बिटियां

नोच लिया,
हवस के दरिंदो ने,
गिद्ध की तरह,
तुम्हारी लाडो को,
लडती रही,
अस्पताल के चारपाई पर

हैवानों की तरह,
मेरे अंग-अंग के,
चिथड़े-चिथड़े कर दिए,
न समझ सके मुझे इंसान,
मांस का टुकड़ा समझ कर,
बोटी-बोटी छलनी कर दी,
अब क्या बचा था मुझमें,
फिर भी मैं जीना चाहती थी,
उठकर उनसे लड़ना चाहती थी,
क्या गलती थी मेरी?
क्यों रौंद दिए मेरे नन्हे-नन्हे सपनों को?
क्या नहीं जन्मे वह किसी स्त्री के गर्भ से?
क्या इसी तरह नोचा था
अपनी मां और बहन को?
यह सवाल पूछना मैं चाहती थी

जीत गए वो आज,
फिर एक बार,
मेरी सांसों के रुकने से,
तुम आये इस शाम,
लेकर हाथों में ज्योति,
क्यों न आते तुम हर उस शाम,
जब मेरे जैसी,
लाखो दामिनी,
चीखती, चिल्लाती और रोती  ... 
                    -सोनम प्र. गुप्ता 


Thursday, December 27, 2012

"अभी तो मैं जवान हूं!"



              हाँ, यही नारा होना चाहिए हमारे समाज के सभी भूतपूर्व युवाओं का। 45 वर्षीय अपनी माँ से जब मैंने कंप्यूटर सीखने की बात कही तो वह कहने लगी मेरी उम्र नहीं है यह सब सीखने की। जब भी हम अपने किसी बड़े को कुछ नया बताना चाहते है तब यह जवाब हमे अक्सर सुनने को मिलता है। हमारे समाज में 30 वर्ष के बाद हर महिला और पुरुष अपने आप को बुजुर्ग की केटेगरी की ओर धकेलने लगता है। हमारे शरीर के बूढ़े होने से पहले ही हमारी सोच को, हमारी जिजीविषा को हम बूढ़ा बना देते है। हम अक्सर ईश्वर की पूजा और आराधना में ही अपने बुढ़ापे को बिताना चाहते है। काम न होने पर मंत्रो के जाप में ही समय गुजारना शायद ईश्वर को भी नहीं भाता होगा। उन्होंने हमे यह जीवन जीने के लिए, निरंतर कुछ नया करने के लिए दिया है। जीवन बेहद छोटा होता है। उसमें भी जीवन के हर पड़ाव बचपन, यौवन, परिपक्कव (मैं बुढ़ापे को यहाँ बुढ़ापा न लिखकर जीवन का सबसे परिपक्व पढाव कहना चाहूंगी) सभी का अपना एक महत्त्व होता है। 2012 में 100 साल की जीवन की लम्बी पारी पूरी करनेवाली अभिनेत्री ज़ोहरा सहगल ने अपने 100वे जन्मदिन पर कहा,"मैं अब भी झूमकर नाचना चाहती हूं। क्योंकि अब भी मैं जवान हूं।" सहगल 50 की उम्र पार करने के बाद भी हर रोज अपना वजन जांचती और जिस दिन भी उन्हें अपने वजन में थोड़ी-सी भी बढ़त दिखती। वह तुरंत अपने खाने पर सही नियंत्रण रखना शुरू कर देती। बहु, पोतोवाली इस महिला को अपने आप को लगातार सुन्दर और सामयिक बनाते देख मुझे अपने युवा होने पर प्रश्न चिन्ह लगता दिखाई देता है। हमारे समाज में बच्चों की शादी होने के बाद, नाती-पोते का मुंह देखने की अभिलाषा रखी जाती है। जब वह भी पूरी हो जाये तो बस अब तो सिर्फ तीर्थ यात्रा करना ही जीवन का अंतिम धेय  बन जाता है। कुछ नया करने, सीखने की बात कहना तो अंधों की नगरी में आइना बेचने जैसा होता है। अगर गलती से कभी किसी खुले दिल के भूतपूर्व युवा ने सोचने की हिम्मत की तो उनके वंश के कर्णधार लोकलज्जा की लम्बी-लम्बी बाते कर उन्हें मंदिर भेज देते है। 
           कई माँ-बाप किसी कारणवश अपनी पढाई पूरी नहीं कर पाते। ऐसे में अगर उनके भीतर अब भी वह इच्छा शक्ति है, तो बेझिझक उन्हें स्कूल, कॉलेज में जाकर अपना नाम दर्ज करवाना चाहिए। मेरे पोस्ट ग्रैजुएशन की क्लास में एक 51 वर्ष के चाचाजी पत्रकारिता की शिक्षा लेने आते है। उनसे पूछने पर कि इस उम्र में आप पत्रकारिता जैसी 24*7वाले कठिन क्षेत्र में क्यों आना चाहते है। उन्होंने कहा,"हमेशा से लिखने का शौक था। पारिवारिक जिम्मेदारियों के चलते मौका नहीं मिला। लेकिन आज जब अपनी अधिकतम जिम्मेदारियां पूरी कर चूका हूं , तो यह समय सिर्फ मेरा है।" आपने अपने बच्चों की इच्छाएं, शौक हमेशा पूरा करने की कोशिश में रहते है। तो ऐसे में अपनी जिंदगी के साथ समझौता क्यों? कुछ भूतपूर्व युवा ऐसे मुद्दों पर कहते है, कि  इस उम्र में पढ़-लिख कर, कुछ नया सीख कर हासिल क्या होगा? यह तो केवल फिजूल खर्ची है। तो उनके सवालों का जवाब मैं अपने जीवन की एक सच्ची घटना से देना चाहूंगी। मैं कुछ वर्ष पहले एक आंटीजी से मिली थी। वह 45 वर्ष की उम्र में अपने शौक के चलते कंप्यूटर सीख रही थी। कोर्स ख़त्म होने के कुछ महीनो बाद उनके पति की तबियत बिगड़ने-से उनकी आर्थिक परिस्थिति डगमगा गयी। बच्चों ने अपने बच्चों और परिवार की स्तिथि का हवाला देकर पहले ही अपने हाथ खड़े कर दिए थे। ऐसे में उन्होंने अपने कंप्यूटर के ज्ञान को समय के साथ थोडा और विकसित किया और उस समय एक क्लासेस में कंप्यूटर सिखाने का काम शुरू किया। आज 2 सालों  के भीतर न केवल उनके घर की आर्थिक स्थिति में सुधार आया बल्कि उन्होंने अपना एक छोटा-सा क्लासेस भी खोल लिया है। इस लिए कभी भी कोई भी ज्ञान व्यर्थ नहीं जाता। हो सकता है कि वह आपको धन अर्जित करने में सहायता न करे लेकिन जीवन में किसी न किसी रूप में वह आपका सहायक जरुर बनेगा।  
         कुछ भी सीखने की कोई उम्र नहीं होती। जब मौका मिले तब कुछ नया करते रहना चाहिए। बचपन से मन में कुछ न कुछ ऐसी इच्छा होती है, ऐसी अभिलाषाएं और शौक होते है जिन्हें पूरा करने का समय नहीं मिलता या मौका नहीं मिल पाता। ऐसे में बढती उम्र में भी अपने आप को जवां रखने का सबसे अच्छा तरीका है। अपने शौक को, अपने अधूरे सपनो को पूरा करने की कोशिश करना। अपनी जिघयासों को हमे कभी मरने नहीं देना चाहिए। अपने नाती-पोतो को पारिवारिक संस्कार देने के साथ-साथ उनसे आज-कल के दौर की नयी बातें सीखने  में हर्ज़ ही क्या है। हर समय अपने आप को अपडेट करते रहना आपके जीवन में जोश और उत्साह भरता है। आप अपने युवा पीढ़ी के लिए न केवल सम्माननीय बन कर रह जाते है। बल्कि साथ ही वे आपको अपना दोस्त बनाने से भी नहीं झिझकते। देर अब भी नहीं हुई, उठिए और अपने पुराने दबे सपनो और ख्वाइशो को बंद पिटारे से खोज निकालिए। खुल कर अपने सपनो को बेझिझक जीने की हिम्मत जुटाइए। कभी सलवार कमीज पहनने  की अभिलाषा रही हो, तो अभी तुरंत जाकर दर्जी को अपना नाप देकर आईये। रंग-बिरंगे शर्ट पहनकर, अपने जन्मदिन पर एक दमदार पार्टी कीजिये। उन सफ़ेद बालों में अगर चेहरे की चमक छिप  गयी हो तो अब भी के अभी बाजार जा कर रंग डालिए अपने आप को नयी उमंगो से। शादी के बाद हनीमून पर जाने की इच्छा थी। लेकिन घर का बजट इजाजत नहीं दे रहा था। तो अब अपनी जमा-पूंजी को नाती-पोतो को सौपने की बजाय अपने लिए कुल्लू-मनाली की टिकिट बुक करवाइए। डांस सीखने की इच्छा बचपन से थी लेकिन मौका ही नहीं मिला। तो अब कहा देर हुई है। हो सकता है कमर उतनी न लचके, लेकिन जितने भी ठुमके लगेंगे वह आपके आपके भीतर के बच्चे को उतना ही जागृत कर देंगे। यह समय आपका है। भूतपूर्व युवा से आगे निकल कर वर्तमान युग के युवा को  पछाड़ दीजिए। जबतक आखिरी सास है तब तक इसे पूरे जोश और ख़ुशी से जीने का पूरा हक़ आपको है। और अगर कोई आपसे यह कहे की बुढ़ापे में इसे जवानी चड़ी है तो पलट कर जरुर कहना," बूढ़ा होगा तेरा बाप!" 
अगर आपने अपने भीतर के बच्चे को अब भी जीवंत रखा है, तो उसकी एक झलक हमारे साथ लिख कर या अपनी तस्वीरों के सहारे जरुर बाटें .
आप हमे मेल कर सकते है, sonamg.91@gmail.com या आप उपर दिए पते पर भी पोस्ट कर सकते है। 
                                                                                                                                   -सोनम प्र. गुप्ता

                                                                                                                                          

Tuesday, December 18, 2012

बढती कीमतों से हताश आम जनता


      मुंबई में पेट्रोल की कीमत महीने-दर-महीने बढती जा रही है। अप्रैल से सितम्बर के बीच ही पेट्रोल की कीमते 75 के पार जा चुकी है। पेट्रोल के साथ डिजेल और सीएनजी की कीमतों में भी बढ़ोतरी हुई। महंगाई का असर पिछले 3 सालों से केवल पेट्रोल ही नहीं बल्कि अन्य  कई महत्त्वपूर्ण वस्तुओं पर पढ़ा है। खाद्यानो की कीमतों में भी पिछले 6 महीनो में काफी उछाल आया है। इस पर भी सोने पर सुहागा हालहिं में सरकार  ने एलपीजी सिलिंडर की कीमतों को बढा दिया साथ ही साल में 6 से अधिक सिलिंडर उपयोग करने पर अधिक कीमत अदा करने पर रोष का माहौल रहा। अगर साल में 6 से अधिक सिलिंडर की आपको जरुरत पड़ी तो बाजार में उसकी कीमत 399 से बढ़कर 746 हो जाएगी। देश भर में सरकार के इस फैसले के खिलाफ महिलायों ने बड़े पैमाने पर प्रदर्शन किये। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने महंगाई पर बात करते वक़्त हालहिं में कहा,"पैसे पेड़ पर नहीं उगते।" देश के प्रधानमंत्री के ऐसे बयान  से देश की जनता को बेहद निराशा हुई। साथ ही उनका गुस्सा सरकार की ओर  बढ़ गया।  नवी मुंबई के ऐरोली की श्रीमती अनीता भुर्के वस्तुओं की बढती कीमतों पर कहती है,"रोज एक एक जरुरी सामान की कीमत बढ रही है। अब घर का बजट तैयार करने में बहुत समस्या होती है।" वाशी की 46 वर्षीय सौम्या राजदान पेशे से प्रोफेसर है। वे कहती है,"एलपीजी की बढ़ी कीमतों से केवल रसोईघर का बजट डगमगा गया है। बल्कि साथ ही गाड़ी का खर्च, यातायात के व्यय में भी बहुत बढ़ोतरी हुई है। मैं और मेरे पति दोनों ही कमाते है। फिर भी बढती कीमतों ने घर चलाना मुश्किल बना दिया है।" दादर की 36 वर्षीय  गृहणी नंदिता गुप्ता कहती है,"अब तो मैं गैस का इस्तेमाल बहुत सोच-समझ कर करती हूँ। साथ ही मैंने तो इलेक्ट्रॉनिक चूल्हा ले लिया है।" सभी अपने अपने तरीके से इस बढ़ी कीमतों से निबटने की कोशिश में लगे हुए है। मध्यवर्गीय परिवार की 38 वर्षीय रहीना शौकत महंगाई का सारा दोष सरकार को देते हुए कहती है,"बड़े लोगो को गैस, सिलेंडर के भाव बढ़ने से क्या फर्क पड़ेगा। कमर तो हमारी टूट रही है। अब खीर-पकवान तो त्योहारों पर ही बनाना होगा। क्योंकि वैसे तो 2 वक़्त का खाना ही नसीब हो जाये बड़ी बात है।" पेट्रोल और डिजेल की मूल्यों में वृद्धि से 4 पहिया गाड़ीवाले 2 पहिये पर गए है। इस पर एक बड़े बैंक में काम कर रहे प्रशांत डाके का कहना है," पहले मैं रोज ऑफिस अपनी कार से आता-जाता था। तक़रीबन 200-300 रूपए पुरे दिन में मेरी गाड़ी का खर्चा हो जाता। लेकिन अब 500 रुपये से भी ज्यादा व्यय हो जाता है। इसलिए मैंने अपनी बाइक निकाल ली है। देखते है कब तक यह बजट में बैठती है।" वही रिक्शा के किराये में बढ़ी कीमतों ने मध्वार्गीय जनता की कमर तोड़ दी है। 68 वर्षीय सुशील मोंडल अपनी बची-खुची पेंसन को आज-कल की कीमतों के सामने घुटने टेकते देख कहते है,"सोचा था, बुढ़ापे में बच्चो के सामने हाथ नहीं फैलना पड़ेगा। रिटायरमेंट के बाद के लिए इतना जमा कर रखा था। लेकिन मेरी आधी जमा राशी तो शुरू के कुछ ही सालों में ख़त्म हो गयी। कहा मजे से अपना बुढ़ापा गुजरने के सपने लिए बैठा था और कहा अब जरूरतों को ही पूरा कर लू। वही बड़ी बात लगती है।" पिछले 3 सालों में रोजमर्रा की वस्तुओं में कीमतों की बढ़ोतरी को देखते हुए 28 वर्षीय मेहुल सावला कहते है,"अब मैंने अपने घर के बजट को लेकर कोई निश्चित सीमा तय करना ही छोड़ दिया है। सरकार  का कोई भरोसा नहीं। कब किस चीज़ की कीमत बढ़ जाये, कब आपका पूरा प्लान चौपट हो जाये। आप इसका अनुमान भी नहीं लगा सकते।" देश की जनता जिस महंगाई की मार से त्राहि-त्राहि कर रही है, उस पर सरकार इतनी लाचार, निष्क्रिय और दिशाहीन क्यों दिखाई दे रही है? प्रधान मंत्री, वित्तमंत्री, कृषि एवं खाद्य मंत्री और सरकार में बैठे विशेषज्ञ बार-बार दिलासा देते रहे कि यह कुछ महीनों में काबू में आ जाएगी। लेकिन ये सारी दिलासाएं झूठी निकली। जिस सरकार का प्रधानमंत्री अर्थशास्त्री हो, उस सरकार से ऐसी अर्थ व्यवस्था निराशाजनक है।

-सोनम गुप्ता