Monday, September 23, 2013

मेरे सपने में पधारे बप्पा

         अक्सर सुना है कि फलाने के सपने में देवी मां आयी थी और मंदिर बनवाने का कह गयी है। ढिमाके के सपने में महादेव आए और रुद्राभिषेक की मांग कर गए। ये सब सुनने के बाद मेरा मन बड़ा दुखी होता। 333 करोड़ देवी, देवताओं और उनके परिवारों या उनके दूर के रिश्तेदारों में से ही सही कोई तो मेरे सपने में आता। मुझे भी मेरे मित्रों, बकवादी पड़ोसियों को रात में देव पधारने की चमत्कारिक किस्से-कहानियां  सुनाने का खूब मन करता है। ये अवसर मुझे कल ही मिला। कल,  हाँ, कल सुबह-सुबह जब मैं नींद से अपना बिस्तर छोड़ने की जदोजहद में थी। तब मेरे सपने में या अधकचरी नींद में न जाने कहां गणपति बाप्पा पधारे। गणपति बाप्पा इसलिए क्योंकि आज-कल जहां-तहां गणपति बाप्पा मोरया के स्वर गूंज रहें हैं। तो ये आज-कल ख़ासा डिमांड में है। बाप्पा अपने बड़े-से उदर और लंबे-से सूड के साथ मेरे सामने हाथ में मोदक लिए चूहे पर सवार प्रकट हो गए। मैं, नींद में अपनी आंखें मिचमिचाती सोचने लगी कि ये आ तो गए लेकिन अगर इन्होने मुझसे मंदिर या महंगे पूजा-अर्चना, दान-दक्षिणा की मांग की तो कलम घिस के बमुश्किल अपना पेट भरनेवाली मैं, कहां से इनकी मांगों को पूरा करूंगी। इस सोच के कुछ अंश हमारे नगरसेवकों, सांसदों, मंत्रियों के यहां से चुराए हुए हैं। मेरी स्वप्न-देव की इच्छा अब चिंता में बदल गयी थी। फिर भी मैंने गरीब, मजबूर आम आदमी की तरह हाथ जोड़ सामने खड़े कर्ता-धर्ता का स्वागत किया। 

      मैंने उनसे डरते-डरते पूछा कि आज आप मेरे यहां कैसे पधारे? बताईए मैं आपकी क्या सेवा करूं? देवों पर सच्ची श्रद्धा हो न हो डरना बेहद जरुरी है। वे सहज ही मेरे सवाल को सुनकर मुस्कुराए और कहने लगे, "बस यहीं से गुजर रहा था। तो सोचा चलो तुमसे मिलता हुआ जाऊं।" मैंने अपनी उबासी को मुंह फुगाकर दबाते हुए कहा, "चलिए, आप आए हैं, तो बताए क्या लेंगे?" उन्होंने मुंह बिचकाते हुए कहा, "क्या दोगी तुम? वही यूरिया के दूध की खीर, मिलावटी मावें की मिठाई, केमिकल्स से पकाए गए फल और सब्जी या जहर मिला खाना?" मेरी नींद आधी पहले ही टूट चुकी थी। इनकी ये बातें सुनकर गुस्से में पूरी टूट गयी। मैंने मानव-समाज का पूरा प्रतिनिधत्व करते हुए कहा, "आज-कल महंगाई इतनी बढ़ गई है, कि हम अपने मां-बाप तक को साथ नहीं रखते। अपने दोस्तों को पानी से ज्यादा नहीं पूछते, रिश्तेदारों को पहचानते वक़्त कर्ज में डूब जाते हैं। ऐसे में आपको मैंने सुबह-सुबह खाने के लिए पूछ लिया। फिर भी आप इतना ऊंचा-नीचा गिनाने लगे। कमाल करते हैं आप भी! आपके पंडालों को हमने देखों कितना भव्य बनाया है। लाखों लोग आपको मेवा-मसाला, फल-फूल का रोज भोग लगाते है। और आप हैं, कि मुंह बिचकाते हैं।" मेरी तिलमिलाहट को देखकर बाप्पा मुस्कुराकर बोले, "देखा! कितने सतही, दिखावटी हो गए हो तुमलोग। अपने ईश्वर के लिए जो किया उसको भी गिनाने में देर नहीं करते। खैर, जो तुम भव्यता की बात करती हो, उससे मुझे क्या मिला? लोगों ने ईश्वर के डर से पैसा तुम्हे चंदा के रूप में दिया, नेताओं ने अपने वोट बनाने के लिए लाखों मेरी भव्यता बढ़ाने में फूंक डाले, देश के कर्ज की बगैर चिंता किए सोने का मुकुट, सोने का मोदक, सोने की माला, न जाने क्या-क्या मुझपर लाद दिया। बंडल-के-बंडल मेरे चरणों में रख दिए। सैकड़ों नारियल मेरे सामने बिखेर दिए।"   

अतिउत्साही मैं, बाप्पा की बात पूरी सुने बगैर अपनेलोगों की वकालत करने लगी, "ये सब आपको प्रिय है। और आप तो इन्ही सबसे खुश होकर मनोकामना पूरी करते हैं।" मेरी उदंडता के बावजूद वो फिर मुस्कुराए, "इसमें कोई दोराय नहीं कि मुझे मोदक, मिठाई,सजावट पसंद है। लेकिन मैं बिकाऊ नहीं। जो पैसों, सोने के बदले तुम्हारी मनोकामना पूरी करूं। मैंने हमेशा कहा है, जैसा करोगे, वैसा ही पाओगे। तुम्हारी कर्मशीलता और प्रेम के अलावा मुझे और कुछ नहीं चाहिए।" वे अपनी बात पूरी कर फिर मुस्कुराए और खुद ही बोलने लगे, " मेरे पंडाल के बाहर कई गरीब, भूके, अपंग पड़े थे। तुम मुझे चढ़ावा चढाने की बजाय उनको खाना खिलाते, उनको तन ढकने का कपड़ा देते तो तुम मेरे लिए कुछ करते। ये जो तुमने नारियल,फूल, मिष्ठान चढ़ाए है, वे अपने व्यापार को बढ़ाने के लिए किया है न कि मेरे लिए। तुम सब स्वार्थी हो गए हो।" मेरे पास कोई जवाब नहीं था। मैं चुप-चाप उनकी छोटी-छोटी आंखों को निहारने लगी। वे बोलते जा रहे थे। मानो, कई दिन से उनके पेट में ये सब भरा पड़ा हो। और आज वे ये सारी बातें मेरे सामने उगलकर ही दम लेंगे। ऐसा करने के बाद उनका उदर बिना जिम गए कम हो जाएगा। 
 "मैं, जानता हूं। तुम मुझमें कहीं न कहीं श्रद्धा रखते हो। लेकिन फिर मेरे नाम पर इतने भद्दे संगीत, भौंडे नृत्य को आयोजित करते हो? मैंने पहले ही कहा है, मैं हर कण में हूं। फिर भी बड़ी-से-बड़ी मूर्ति सजाने की होड़ में लगे रहते हो। मेरा दूसरा घर सागर में,जल में है। इसलिए तुम मुझे जल में विसर्जित करते हो। लेकिन तुमने मेरे घर को भी दूषित कर दिया है। मेरे सारे जलचर मित्रों की आयु को कम कर दिया है।" जलचरों का नाम सुनते ही, मुझे ख्याल आया, कि कहीं हमारे नेताओं और संतों के गुस्सैल समर्थकों की तरह, इन जलचरों में से कुछ गुस्सैल समर्थकों ने गुस्से में इस बार गणेश-विसर्जन को गए भक्तों के पैर नोंचने का काम तो नहीं किया? सोचा बाप्पा से अपनी ख्याल की पुष्टि करूं। ताकि पता लगे, कि आदमी के साथ-साथ ऐसी भावनाएं और भी जीवों में होती हैं। लेकिन फिर उन्हें डिस्टर्ब करने की हिम्मत नहीं हुई। वे आज मूड में थे। वे फिर बोले, "मुझे विसर्जित करने के लिए तुम नाचते-गाते आते हो, मुझे बहुत अच्छा लगता है। लेकिन वहीं पटाखों के शोर से मेरे कान सुन्न पड़ जाते हैं। उसके गंदे धुवें से मेरी सांसे घुट जाती हैं। मेरे बुजुर्ग मित्रों के दिल की धड़कने बढ़ जाती हैं। मैं, सबका बाप्पा हूं। मेरा एक बच्चा मस्त हो और दूसरा पस्त तो मैं कैसे खुश हो सकता हूं।" अब बाप्पा की बातों में मुझे दम नजर आने लगा। मैं गहन सोच में डूबती जा रही थी। मैंने अपनी बुद्धि को खूब दौड़ाया और फिर चतुर गणेशजी से पूछा, " तो फिर क्या हम गणेशोत्सव मनाना ही छोड़ दे! तुम्हे घर बुलाना ही बंद कर दें!" तो वे गंभीर होते हुए बोले, "नहीं, मैंने ऐसा कब कहा? तुम मुझे बुलाते हो, मुझे अच्छा लगता है। लेकिन मेरी वजह से अपने घर के बजट को मत बिगाडों। मैं तुम्हारा साथी हूं, तुम्हारा अपना हूं। मुझे अपने जैसा रखो। मुझे कोई स्पेशल ट्रीटमेंट की चाह नहीं है। हाँ, बस थोड़ी साफ़-सफाई रखा करो और अपने हाथों से मोदक बनाकर खिला दिया करो।" ये कहते हुए उनके हाथ उनके उदर पर फिर रहे थे। "मेरे नाम पर समाज,पर्यावरण को दूषित मत करो। सोचो, कितना अजीब लगता है जब मेरे आने की तैयारी के साथ-साथ मजबूरन सरकार को ध्वनि प्रदूषण और जल प्रदूषण जांचने की मशीन लगानी पड़ती है। पुलिस को लड़कियों की सुरक्षा के लिए विशेष दस्ता बनाना पड़ता है। सोचो, कैसा लगेगा जब तुम्हारे जाने के बाद घर में जहां-तहां प्रदूषण हो। विसर्जन के बाद मेरा एक-एक अंग छितिर-बितिर होकर यहां-वहां समुंद्र के किनारे पड़ा हो।"

ये सब सुनते-सुनते मेरे भीतर शर्मिंदगी घुमड़ने लगी। अबतक मैं उनकी आंखों को निहार रही थी। उनके साथ तर्क करने में जुटी थी। पर अब अपराधबोध के भाव ने मेरी नज़रों को झुका दिया था। वे मेरी झुकी हुई नजरों को उठाते हुए बोले, "तुम निराश न हो। अपनी गलतियों को समझो और उसे सुधारने की कोशिश करो।" उनका गला रुंध गया था। वे आंसुओं को गले से नीचे उतारते हुए बोले, "मेरा तुम्हारे घर, मुहल्ले में आना अब एक व्यापार बन चुका है। पहले दिन से लेकर 11 वें दिन तक सिर्फ स्वार्थ ही देखने को मिलता है। मुझे तुमलोगों का प्यार चाहिए। मैं, तुम्हारा मित्र, तुम्हारा सखा, तुम्हारा पिता, तुम्हारी माता, तुम्हारी बहन बनने आता हूं न कि तुम्हारे जेब को तौलने।" इतना कहते-कहते वो अदृश्य हो गए। मैं, अब नींद से बाहर थी। पूरी तरह से। मेरे दोस्तों, पड़ोसियों की तरह मैंने उन्हें अपने देव-दर्शन और उनके संदेश को सबको बतलाया। तो वे सब मुझपर हंस पड़े और कहने लगे, "तुम नास्तिक किस्म की हो। इसलिए ऐसी मनघड़क कहानियां कह रही हो। ईश्वर आए और तुमसे कुछ बनवाने या दान करने को नहीं कहा ऐसा संभव नहीं। झूठी कहीं की!"  
अगले दिन पता लगा कि कल रात को बगल की नैना आंटी के सपने में बाप्पा आए थे। उन्होंने उससे बेटी की शादी के बदले में अगले बरस सोने का मुकुट मांगा है। उसके सपने पर  सबको यकीन हो गया। शायद बदले की भावना इतनी तीव्र हो गयी है, कि रात के सपने ही हकीकत लगते है। वास्तविकता को छूने तक की हिम्मत हम में बची नहीं है।

 - सोनम गुप्ता




Friday, September 20, 2013

हेयर सिरम और गांठ

नहीं सुलझ रही,
जुल्फों की उलझने,
लगा लिया
हेयर सिरम, 
गांठे,
फिर भी,
अर्झी की अर्झी,
टूट गयी,
कुछ कमजोर कड़ियां,
तो कुछ जड़ से उखड गयी,
कंघे के साथ घर्षण में,
कुछ संभली और कुछ चल बसी,
उलझी हुई गुत्थियों में,
कट्टर धागे ,
कुछ आधे हो गए,
तो कुछ की उलझने बढ़ गयी,
सिरम से,
किनारा करते -करते,
गिरते-पड़ते,
संभलते-बचते,
कुछ सूखी-भूखी रह गयी,
तो कुछ गीली हो,
जंजीरों को तोड़,
अलग हो गयी ...

- सोनम गुप्ता 


Sunday, September 15, 2013

हवा में लटकते कुछ सवाल

कुछ सवाल ऐसे होते है जिनके जवाब ना दिए जाए तो बेहतर होगा। वो अनुत्तरित ही अच्छे है। और अगर आप ताव में आकर उनका जवाब देने की कोशिश करें तब भी कुछ नहीं हो सकता। क्योंकि वो सवाल सवाल बने रहने के लिए ही जन्मे है। उनका जवाब नहीं होता। वे सवाल बनकर जन्म लेते है और आजीवन सवाल ही बने रहते हैं। उनका बचपन, जवानी, बुढ़ापा उम्र के सारे पड़ाव सवाल बनकर ही गुजर जाते हैं। उनमें जवाब बनने की ना हिम्मत होती है और ना ही जुनून। उनको पूछते ही वो हवा हो जाते हैं। वो हवा में लटके सवाल होते है। ऐसे हवा में यहां-वहां लटके सवाल संसद में खूब देखने को मिलते हैं। वहां तो लोग अपना सिर खूब बचा- बचाकर चलते हैं।  न जाने कब कौन-सा सवाल उनके सिर से आ टकराए। कुछ सवाल लटके-लटके ढीले हो जाते है और थोडा नीचे आ जाते हैं। तब वो सिर की बजाय आंख, नाक, मुंह, गर्दन, छाती, आदि-आदि जगह पर आकर लड़ते हैं। ऐसा नहीं कि सिर्फ लंबे समय से लटके सवाल ही सिर के बजाय कहीं और लड़े। कई लोगों की ऊंचाई ज्यादा होने से सवाल यहां-वहां आकर उनसे भिड़ जाते हैं। 
           इनमें भी सबसे मजे में वो लोग होते है जिनका कद छोटा होता है। वे बेबाक होकर पूरे भवन में सवालों को मुंह-चिढ़ाते हुए यहां-वहां फिरते रहते हैं। लेकिन हर कुत्ते का दिन होता है। नहीं, मैंने उनको कुत्ता नहीं कहा भाई! आप भी न मेरी बातों में अपनी कल्पना के पुल बनाने लगते हैं। मेरा मतलब है, कभी ख़ुशी पलड़े में होती है, तो कभी गम। कुछ सवाल इतने नीचे लटके होते हैं। इतने व्यापक होते हैं, कि उनसे क्या छोटे, क्या मध्यम और क्या बड़े कदवाला सब टकराते हैं। और ऐसा टकराते हैं कि उनके सिरो पर रसगुल्ले निकल आते हैं। नाक पर चोट लग जाती है। आंखे चौंधिया जाती हैं।  गर्दन तंग हो जाते हैं। कभी-कभी तो सवालों की गंभीरता के चलते वे अस्पताल तक पहुंच जाते हैं। सवाल खुश होता है, अपनी मजबूती दिखाकर। लेकिन जैसा कि मैंने पहले कहा ये सवाल, सवाल बने रहने के लिए जन्मे हैं। इसलिए घंटो हंगामे के बाद भी ये जवाब नहीं बन पाते। मूर्ख सवाल समझता है कि उसके बल से, उसका जवाब ढूढने की चिंता में सांसद महोदय अस्पताल पहुंचे। लेकिन सांसद महोदय तो सवाल को सवाल बने रहने देने के लिए वहां से चलते बने थे।  
         लोकतंत्र में सवाल का ऊठना और ऊठाना उसे सशक्त बनाने के लिए बेहद महत्त्वपूर्ण है। हम भी एक लोकतांत्रिक देश हैं! ये कोई सवाल नहीं है। खैर, हमारे पास भी कई सवाल है। जो ऊठते और ऊठाए जाते हैं। जो यहां-वहां हर जगह हवा में लटके हैं। इन लटके हुए सवालों के भी दो मुख्य प्रकार होते है। उनकी महत्ता, आवश्यकता, संपन्नता, सामयिकता, लाभ-हानि, पूछे जानेवाले की जेब, कद, ओहदा, इत्यादि के आधार पर इन्हें विभाजित किया जाता है।  जैसे: - रामलखन चाचा कब अपनी फसल को ठीक दाम पर बेंच पाएंगे?, कब वो बिचोलियों से बच पाएंगे?, सत्तन की पत्नी कबतक सेठो को खुश करके अपने पति की मजदूरी बचाए रखेगी? सीमा आंटी कबतक बिना प्याज, तेल के सब्जी बनाएगी? लल्ली, पप्पू, डब्बू, शब्बो कब स्कूल जाएंगे? और अगर चले गए तो वो जिंदा वापस आएंगे या नहीं? वगैरह, वगैरह।  ये आम आदमी के सवाल हैं। बेहद सस्ते और निहायती व्यर्थ सवाल। इनका जवाब देना कोई जरुरी है, क्या! ये तो सवाल ही अच्छे लगते हैं। ये केवल सवाल ही बने रहेंगे उनका कोई जवाब कभी नहीं मिलेगा इसका मुझे क्या सारे देशवासियों को शर्तिया विश्वास है।  
           हाँ, सवाल की गरिमा बढ़ानेवाले सवाल जैसे सवाल तो ये है कि नमो प्रधानमंत्री बनेंगे या नहीं? मैडम के बेटे नमो को हरा पाएंगे या नहीं? आडवाणीजी नमो के नाम से खुश है या नहीं? अगर नहीं है, तो उनको मनाने की योजना बनी या नहीं? मैडम के बेटे की शादी होगी या नहीं? और होगी तो कब, किससे, कहां और कैसे होगी?,इत्यादि ऐसे कई देश के लिए बेहद महत्त्वपूर्ण और अति संवेदनशील सवाल यहां-वहां मीडिया के कैमरों और पन्नो के बीच लटके हैं। दोनों तरह के सवालों में केवल एक ही समानता है, कि दोनों ही जवाब रहित हैं।  ये सवाल बेजवाब है या कह सकते है लाजवाब है। ऐसे सवालों से बचा भी नहीं जा सकता और ना ही लड़ा जा सकता है। झूठे जवाब आत्मसम्मान को ठेस पहुचाएंगे और सच्चे जवाब सवाल किए जानेवाले लोग नहीं पचा पाएंगे। बड़ी दुविधा है। बहुत चिंतक स्थिति है। सवाल पर सवाल, सवाल पर सवाल। मगर सारे सवाल बिना जवाब।

  -      सोनम गुप्ता 

दबंग दुनिया में प्रकाशित लेख का कट-आउट (15/09/13) 

Sunday, September 8, 2013

शहादत, राजनीति और मीडिया

       8 अगस्त को पुंछ के बॉर्डर पर 5 सैनिक शहीद हो गए। मानसून सेशन शुरू होने की वजह से मुद्दा सदन रद्द करने की वजह बन गया। बगैर देर किए शहीदों के नाम पर सियासत भी जोर पकड़ने लगी। कहीं सरकार की जुबान फिसल गई, तो कहीं विपक्ष को सरकार का शांत रवैया नहीं पसंद आया। अपने राष्ट्र के सैनिक जब शहीद होते है, तो देश के हर नागरिक का खून खौलना लाजमी हैं। दिहाड़ी मजदूर से लेकर सेंसेक्स के दफ्तर में बैठे देश के हर नागरिक की नाराजगी स्वाभाविक है। लेकिन राजनितिक उग्रता क्या सचमुच देश के प्रति है या फिर मात्र देशभक्ति जताने के लिए ये आक्रोश टीवी चैनलों पर दिख रहा है, यह सोचनेवाली बात है। विपक्ष उग्र न हो, तुरत-फुरत कारवाई की मांग न करे, तो देश की जनता जो स्वाभाविक रूप से आक्रोश में है। उसे वह अपने पक्ष में कैसे ले पाएगी। सरकार आवेग में आकर ऐसा कोई फैसला नहीं ले सकती, जिससे उसकी छवि बिगड़े। सरकार और विपक्ष कहीं न कहीं इसमें अपना स्वार्थ साधते नजर आते हैं। 
      इन सब के बीच आम नागरिक सही फैसला लेने के लिए, सारी जानकारी हासिल करने के लिए मीडिया पर निर्भर रहता हैं। ऐसे में सवाल यह उठता है, कि क्या मीडिया जो लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है-फ़िलहाल उसपर भी प्रश्न चिन्ह लगता नजर आ रहा है। वह ऐसे समय में अपना दायित्त्व ईमानदारी से निभा रही हैं? मीडिया का काम जनता के सामने तथ्यों को रखना होता हैं। उन्हें सोचने पर मजबूर करना होता हैं। न कि तथ्यों को तोड़-मरोड़कर अपना नजरिया आम आदमी पर थोपना। फैसला करना, अंतिम राय बनाना मीडिया का काम नहीं होता। जिस समय आम आदमी राष्ट्रवाद के उबाल में है, उस समय मीडिया को अपने होश नहीं खोने चाहिए। कई न्यूज चैनलों पर राष्ट्रवाद के पैरामीटर लगा दिए गए। जिसका निर्णय एसएम्एस द्वारा किया गया। एंकर दर्शकों के भावनाओं से सीधे जुड़ने के लिए आक्रोश में आ गए। टीआरपी के चक्कर में सच्चे देशभक्त के खाके मीडिया तैयार करने लगा। अगर आप गुस्से में हैं,पाकिस्तान पर बम छोड़ने के पक्ष में हैं, तो आप देशभक्त हैं। अगर आप अब भी शांति से बात सुलझाना पसंद करते है, तो आपको अपने देश से प्यार नहीं। पकिस्तान पिद्दीभर देश है, जिसे हम एक झटके में उड़ा सकते है, वगैरह, वगैरह। ऐसे कई तरह के युद्ध उन्माद फैलानेवाली बहसे करवाते और बिना सिर-पैर के तर्क देते कुछ चैनल नजर आए। न जाने क्यों ऐसे समय में मीडिया की भाषा अचानक से विकृत हो जाती है। हमे यह समझना होगा कि युद्ध किसी भी समस्या का हल नहीं होता। युद्ध से किसी भी राष्ट्र में शांति नहीं स्थापित की जा सकती। अपितु उससे भंग जरुर होती है। बात-चीत करना कमजोरी की निशानी नहीं होती। बशर्ते सही दिशा में, सटीक और सीधी बात की जाए। लेकिन कुछ चैनल अपने पूर्वाग्रहों से इतने ग्रस्त नजर आए कि उन्होंने आप ही सही-गलत तय कर लिया। घटना के बाद बेहद संवेदनशील कश्मीरी बॉर्डर पर कुछ चैनल राष्ट्र की सुरक्षा को ताक पर रखकर वहां सबसे पहले पहुंचने का दावा करते नजर आए। वे रिपोर्टिंग कम अपने जान की बाजी लगाकर वहां पहुचने पर ज्यादा प्रकाश डालते रहे।  
      आम नागरिक जिस ओर ज्यादा झुकाव देखता है। उसी करवट बैठता हैं। उसे हमेशा न्रेतित्व की आवश्यकता होती है। मीडिया जनता की आवाज होती है। उसे गोलीबारी के बदले गोलीबारी करने की आम राय पेश करने की बजाय इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि देश के नागरिक को इस मुद्दे के कितने वास्तविक तथ्य मालूम है। क्या पुंछ में जो हुआ उसे हम उसी रूप में उन तक पहुंचा पाए हैं? जो इस देश के नागरिक को मालूम होना चाहिए था, क्या वह हम उन्हें बता पाए हैं? जब तथ्यों की कमी होती है और मीडिया जजमेंटल हो जाता है। तब अंधराष्ट्रवाद जन्म लेता है। अंधराष्ट्रवाद आतंकवाद से भी भयंकर रूप ले सकता है। वैमनस्य का माहौल बनाने से अराजकता ही फैलती है, कि न की शांति के सुमन खिलते हैं। मीडिया को इस लोकतंत्र में अपनी भूमिका को फिर से समझने की जरुरत है।         

 - सोनम गुप्ता

भारतीय सेना  को सलाम