Thursday, April 5, 2012

कुछ कहती है यह पंक्तिया


"तुम्हारी मुस्कान है बिखेरती खुशियाँ चारो ओर,
विसुरणों को भुलाकर देखो मैं भी खिल-खिला उठी,
जादू है इन लबों की हरकत में,
जो मैं अपने ग़मों को भुला गयी,
चेतना नयी जाग उठी तुम्हारी बातों से,
प्रफुलित हुआ यह मान तुम्हारे परिचय से,
उम्मीद है यह रिश्ता कायम रहे अनंत तक,
क्योंकि मुस्कुराने की चाह मुझमें है अब बढ़ गयी."


"हवा की झोके की तरह आए तुम
और आंधी की तरह सब तबाह कर चल दिए,
बंजर बन गयी मेरी हरी-भरी बढती बगियाँ.
जो तुम इस तरह धोके की लपटों में उसे जला बैठे."

Tuesday, April 3, 2012

वो बेफिक्र बचपन


आज ट्रेन में १२-१३ साल के छोटे बच्चें से मुलाकात हुई. स्कूल के यूनिफार्म में वह मुझसे काफी दूर बैठा था पर मेरी नज़रों की सीमा के भीतर... जब मेरी नजर उसपर पड़ी तो वह अजीब-अजीब से भाव अपने चेहरे पर बनाता नजर आया. कभी नाक सिकोड़ता तो कभी भौवें चढ़ाता, तो कभी अपने होठों से तरह-तरह के आकार बनाता और कई बार तो सिर को ही घुमा देता...उसे देख कर मुझे लगा की वह असामान्य, विशेष बालक है. लेकिन जब कुछ देर बाद वह अपने मूल रूप में आया और अपने चेहरे के भावों को एक-एक कर ठीक करने लगा ...तब पता लगा की वह हमारी ही तरह साधारण बच्चा है. वह तो केवल मस्ती कर रहा था. अपनी नन्ही सी जिघ्यासाओं भरी दुनिया में सैर-सपाटा कर रहा था.बचपन में हम कितने बेफिक्र होते है. हमे दुनियां, समाज, लोगों से कोई मतलब ही नहीं होता. बगैर अपने आस-पास के लोगों की परवाह किये. अपने मैले कपड़ों, चौकोलेट से रंगे मुंह, मिटटी से सजे हाथो के साथ अपनी ही दुनिया में खोये रहते है. न कोई फ़िक्र, न कोई हिचक और न ही कोई शर्म होती है. बस मस्तमौला अंदाज़ में जो जी में आया पहन कर, जैसा मन किया वैसा करते, गिरते-पड़ते चलते. यह तो था हमारा सुनहरा चिंतामुक्त बचपन, अब तो यहाँ पहनावे से लेकर चाल तक हम अपने आस-पास के लोगों, समाज को ध्यान में रख कर करते है. वो क्या कहेंगे, वो क्या सोचेंगे, अगर खाना हाथ से खा लिया तो इज्ज़त ना चली जाये, इत्यादि. अपने से ज्यादा लोगों की सोच और इच्छा की परवाह होती है. मन तो करता है सबका की आज भी दाल चावल अपनी उँगलियों से खाएं पर कमबख्त यह इज्ज़त और स्टेटस की चिंता हमारे हाथो में छूरी और काटा पकड़ा देती है. आज भी मन करता है कि जोर से खुल कर हसे पर लोगों में फजती न हो जाये इसलिए होठ एक निश्चित सीमा तक ही खुलते है न कम न ज्यादा, दिल करता है कि कभी वो बचपन के कुछ खेल खेल ले ...लेकिन अब कहा वो निस्वार्थ दोस्त रह गए जो केवल हमारे साथ के लिए हमारे साथ अपना खिलौना बाटें, अपने नापसंद डिब्बे को दे कर, हमारा टीफिन मांग ले और यह भी कहे की "देख यार, मम्मी को पता नहीं चलना चहिये, तू किसीको बताना मत वरना खूब डांट पड़ेगी." मन तो अभी करता है पर लोक लज्जा हाथों को बढने ही नहीं देते. सामनेवाला हमे लालची न समझ ले. हाय! काश वो बचपन हमेशा साथ होता, काश अब भी हम बेफिक्र हो अपने मर्ज़ी के मुताबिक चलते, जो जी में आता वो करते. प्यार और सौह्याद्र के आलावा कुछ न समझते. काश स्वार्थ, लोभ, इर्शिया जैसे कुलक्षण हमे छू भी न पाते. काश यह हमारी मां के डांट से डरते और हमसे दूर कही चले जाते. काश अब भी हमारी दुनिया पिताजी के १० रुपयें में और मां की गोद में ही सिमटी रहती.


Monday, March 26, 2012

घूंघट से नहीं झलकते संस्कार

हिन्दू धर्म में जहां लड़कियों को देवी का दर्ज़ा दिया गया है, वहीं भ्रूण हत्या, बाल-विवाह, अशिक्षा और दहेज़ प्रथा जैसी कुप्रथाएं पंडितों के दोगुले स्वभाव और स्वार्थ को प्रदर्शित करता है. हमारे समाज में कन्याओं को पूजनीय मान कर माता-पिता का चरण न स्पर्श करने का नियम है. लेकिन ऐसे नियम का क्या फायदा जहा स्थान सर्वोच्च देकर मूलभूत अधिकारों से वंचित रखा जाता हो. लड़कियों की यह स्थिति तो हमारे देश के राष्ट्रपति की तरह हो गयी है जहां पद तो सबसे उचां है लेकिन अधिकार और कार्य के नाम पर खाली चिटठा है. बेहद शर्म की बात है कि हमारे समाज में आज भी लड़कियों को सफलता देनेवाली और उच्च शिक्षा से वंचित रखा गया है. जहां लड़कियां हर क्षेत्र में अपना लोहा मनवा चुकी हैं वहीं लड़के और लड़की के बीच आज की इक्कसवी सदी में भी अंतर किया जाता है. कई परिवारों में शिक्षा के नाम पर लड़की को बेमन ही साधारण से विषय चयन कर स्नातक बना दिया जाता है. भले ही उसमें बेटे से कई अधिक पढ़ने की क्षमता हो. बेटे के ही वंश चलाने जैसे सोच के कारण लड़कियों को बेटों जितना सम्मान नहीं मिल पाता. विवाह के बाद घूंघट जैसी प्रथा हमारे समाज के पिछड़ेपन की गवाह है. जिस कन्या को शादी के पहले मुह नहीं ढकना होता था उसी लड़की को विवाह के बाद लम्बा सा घूंघट काढ़ने को कहा जाये तो इसमें कोई माननीय तर्क समझ नहीं आता. ससुरालवाले भी तो उसके अपने परिवारवाले है जहा वो अपने जीवन का आधे से भी अधिक समय गुजारती है. उसके सास-ससुर उसके माता पिता ही हुए, जेठ बड़े भाई समान तो क्यों अपनों के ही समक्ष मुह ढकना? जहां तक बात सम्मान की है तो जरुरी नहीं कि वह मुह ढकने से ही व्यक्त हो. ऐसे कितने ही परिवार है जहां बहुएं बगैर घूंघट के अपने ससुरालवालों को खुश रखती है साथ ही आधुनिक महिला के नए रूप को भी निभा रही है. कुछ परिवारों में तो दो फुट लम्बा घूंघट काढ़े महिलाएं अपने सास-ससुर के सामने गाली-गलोज करती नजर आती है. तब हमारे संस्कार और सम्मान की नुमाइश को कौन-सा दामन रोक पाता है. सम्मान और संस्कार तो व्यवहार में होते है न कि ९ मीटर की लम्बी साड़ी और २ फिट के घूंघट में. और अगर व्यहारिक रूप से भी देखा जायें तो महिलाओ के लिए घूंघट में अपनी भूमिका सफल रूप से निभा पाना कितना मुश्किल है. अब हमारे सम्माननीय बुजुर्गों का यह सवाल होगा कि पहले की औरते तो सब कर लेती थी, आज की लड़कियों को नए ज़माने का चस्का लगा है. पहले का जमाना कुछ और था, तब महिलाओं को दहलीज से बाहर कदम रखने तक की स्वतंत्रता नहीं थी. आज हमारे समाज की लड़कियां देश- परदेश में अपने परिवार का नाम रोशन कर रही है, लड़कों के संघ कन्धा से कन्धा मिला चल रही है. दफ्तर के साथ घर, परिवार और बच्चों का भी पूरी सजगता से ख्याल रखती है. घर खर्च चलाने में अपने पति का साथ दे रही है, अपने बच्चों के उज्जवल भविष्य के लिए सहायक निवेश कर रही है. ऐसे में इतना कुछ करने पर भी अगर उन्हें अपना मुह ढक कर चलना पड़े तो यह उनके साथ सरासर नाइंसाफी होगी. गर्व महसूस होता है कि हमारे समाज में ऐसे कई परिवार है जहां बहु को न केवल शब्दों में बेटी कहा गया है बल्कि, उसे सचमुच अपने बेटी ही कि तरह प्रेम और आज़ादी दी गयी है. और उन बहुओं ने भी अपने ससुराल को मायके से भी अधिक प्यार और सम्मान दिया है. पर दुःख इस बात का है कि ऐसे परिवारों कि संख्यां उँगलियों पर गिनी जा सकने जितनी ही है. समाज के विकास के लिए नकारात्मक और पिछड़ी सोच का बदलना बेहद जरुरी है. अगर बहु को बेटी का दर्ज़ा दिया जाता है तो बेटी की ही तरह उसके पहनावे को भी स्वतंत्रता दे. जमाना तेजी से बदल रहा है, हम आधुनिकरण की दुनियां  में रहते है. ऐसे में समय नियम बदलने में जादा देर नहीं लगेगी. इस से पहले की आपके अपने बहु, बेटे, दामाद आपकी राय को नजरंदाज़ करे, आप आगे बड़े. बदलते ज़माने के साथ सोच में नयापन लाये और अपनों की ख़ुशी के लिए अपने रीती-रिवाजों में छोटे- मोटे संसोधन करने में हर्ज़ ही क्या है. रीती-रिवाज तो बनाये ही गए है सुविधाजनक और  सरल जीवन के लिए न की बेमन से उन्हें सदियों तक बिना किसी तर्क के ढोने के लिए. 















मेरी यह बात कई बंधुओं को पसंद आएगी और कईयों को न गवार गुजरेगी. ऐसे में मेरी उन सभी से विनम्र निवेदन है कि कृपया अपने मतों और तर्कों को sonamg.91@gmail.com  पर मेल कर हम तक पहुचाएं. जिससे हमे इस निरर्थक रिवाज को बदलने और समाज को उन्नत बनाने में सहयता मिलेगी. 

Sunday, February 12, 2012

पहले दर्जे में पहला दिन

एक महीने तक तबियत ख़राब रहने के बाद जब नौकरी पर पुनः जाने का सोचा तो मां को यात्रा की चिंता होने लगी.
भीड़-भाड़ में बेटी के स्वास्थ के बिगड़ने का डर उन्हें सताने लगा. तब सलाह-मशवरह से यह निश्चित किया गया कि मैं ३ महीनो तक रेल के पहले दर्जे के डिब्बे में सफ़र करू. अब ३ महीने इसलिए क्योंकि ३ महीनो का पास एक साथ निकलवाने से विशेष छुट मिलने की जानकारी थी. भाई ने बड़े प्रेम से पास निकलवाने की जिम्मेदारी ली. मैंने पैसों के बारें में सोचते हुए उसे बार- बार हिदायत दी कि यदि ज्यादा कीमत हो, छुट न हो तो न निकालना. पर भाई और मां का प्यार मेरी पैसों की चिंता से बड़ा था और उन्होंने १ महीने के लिए मेरे न कहने पर भी पहले दर्जे का पास बगैर छुट के बनवा दिया. मैं मन ही मन कोसने लगी कि इतने पैसों में तो मेरे ३ महीनो का पास बन जाता...थोडा नोक-झोंक करने के बाद मैंने सोचा अब इस बात पर विवाद कर कुछ फायदा नहीं...चलो अच्छा है पहली दर्ज़ा में सफ़र करने का भी मजा उठाया जाये और कुछ नए अनुभवों से मिला जाये. इसी सोच और जिघ्यासा को लिए मैं स्कूल के बाद कई वर्षो के अन्तराल पर पहली दर्ज़ा में सफ़र करने के लिए निकल पड़ी. ट्रेन आई और मैं उसमें चढ़ कर चूँकि सारे सीट (जो मुश्किल से २० लोगों के बैठने के लिए थे )भरे थे इसलिए सीट की ओर लाचारी से निहारने लगी. इसके अलावा और कोई विकल्प भी नहीं था. थोड़ी देर में एक महिला सीट पर से उठी और उसकी सीट पर झट से दूसरी पास खड़ी महिला बैठ गयी, जबकि वह सीट पहले से ही किसी और खड़ी महिला ने चड़ते ही आरक्षित कर रखी थी. अब क्या था मैंने सोचा बड़ा मजा आयेगा पहले ही दिन कुछ नया देखने मिलेगा...उच्च वर्गीय महिलायों के बीच झगडा देखने का इस से सुन्दर अवसर कहा मिलेगा. लेकिन यह क्या मेरी सारी उम्मीदों पर पानी फिरने में चंद पल लगे. जिस महिला ने पहले से ही सीट आरक्षित कर रखा था उसने बैठी महिला की ओर तुच्छ निगाहों से घूरा और उस बैठी महिला ने घुटनों पर हाथ रखते हुए मूक रूप से लाचारी व्यक्त की और बात वहीँ निपट गयी. न कोई सवाल, न जवाब, कोई विवाद ही खड़ा नहीं हुआ. बस इशारों में ही मसला सुलझ गया. खैर मेरी उच्च वर्गीय महिलायों के बीच झगडा देखने की अभिलाषा पर तो पानी फिर गया लेकिन डिब्बे में छायी शांति को देख मन को बड़ी ख़ुशी हुई.


Monday, January 30, 2012

निंदियाँरानी

निंदियाँरानी कही दूर भाग गयी है मुझसे ,
पलकों से उड़कर कहीं छिप गयी झट से.
             नीले अम्बर में है जा मिली,
             सूरज की नयी किरण तक,
             सपनों की दुनियां राह भूल गयी,
             नहीं है आज पहुंची मंजिल पर,
निंदियाँरानी कही दूर भाग गयी है मुझसे ,
पलकों से उड़कर कहीं छिप गयी झट से.
            कब से राह ताक रही हूँ मैं,
            अंधियारे में भी जाग रही हूँ मैं,
            मां है थक गयी लोरियां गा कर,
           फिर भी अँखियाँ मूंद रही हूँ मैं,
निंदियाँरानी कही दूर भाग गयी है मुझसे  ,
पलकों से उड़कर कहीं छिप गयी झट से.
              जाने कौन-सी गलती हमसे हो गयी,
             सपनों की दुनिया जाने कहां खो गयी,
             कहानी सुन-सुनकर अब मैं भी ऊब रही,
             आज बिन पलके झपके भोर हो गयी,
निंदियाँरानी कही दूर भाग गयी है मुझसे,
पलकों से उड़कर कहीं छिप गयी झट से.
             इक जम्भ्वाई भी आज नहीं छूटी,
             कोई अंगड़ाई आज नहीं है टूटी,
             यह रजनी जाने क्यों चिंता में है डूबी,
             आँखों की है जैसे किसमत फूटी.



Monday, November 14, 2011

बच्चा पार्सल


आज लोकल डिब्बे में दो महिलाएं थर्माकोल के दो बड़े डब्बे ले कर बैठी थी...उसमें दोनों तरफ दो-दो १ के सिक्के जितना छेद था. और उपर डिब्बे में कटिंग कर उसपर पारदर्शी प्लास्टिक लगा हुआ था.
सभी औरते झांक-झांक कर उस डिब्बे के भीतर दिखने की कोशिश कर रही थी. पर कुछ समझ नहीं आ रहा था. थोड़ी देर बाद उस डिब्बे की मालकिन ने डिब्बे के ढक्कन को हलके से उठाया और उसमें हाथ डालकर मुस्कुराने लगी.
सभी औरते एकदम चौक कर उस डिब्बे में झांक रही थी. मैं काफी दूर बैठी थी इसलिए मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था... सभी के चेहरे पर उठते अलग-अलग भावों ने मेरी जिज्ञासा को जन्म दिया. और मैं उस डिब्बे के राज़ को जानने के लिए बेचैन हो गयी. तभी थोडा पास जाकर उस खिड़कीनुमा पारदर्शी प्लास्टिक से मैंने झाका तो उसमें कपडे लिपटे से दिखे...मुझे लगा कोई जानवर होगा. वैसे ही उस रहस्यमय डिब्बे से हलकी सी आवाज़ उठी जो अपने जाती-प्रजाति की सी लगी ..तब उस डिब्बे की मालकिन ने फिर से उससे खोला तब मैंने जो उसके भीतर देखा. उसे देखर मेरी आँखें खुली की खुली रह गयी. उसके भीतर एक बेहद दुर्बल नन्ही परी थी. जाहिर सी बात है की दुसरे डिब्बे में भी उसकी ही बहिन थी. कारण यह पता लगा की बचियाँ सातवे महीने में जन्मी है, इसलिए बेहद कमजोर है. दुर्भाग्यवश, पैसों की कमी के चलते वे टैक्सी या रिक्शा नहीं ले पाए...और मजबूरन इतनी मार्मिक अवस्था में ट्रेन से सफ़र कर रहे थे...उन दोनों कन्याओं का पहला मुंबई रेल सफ़र वह भी थर्माकोल के डिब्बे में...बेहद रोचक था...
यह हमारे भारत का ही रंग है जहां खाने के साथ-साथ बच्चे भी डिब्बे में पार्सल होते है...


Thursday, November 3, 2011

लोकल डिब्बे में विदेशी रंग


आज लेडिस डिब्बे में एक नया रंग देखने को मिला. वो था गोरो का रंग. हमेशा की तरह वडाला से मैं ट्रेन में चडी और चड़ते ही एक कोना धुंडने लगी तभी मैंने देखा की डिब्बे के अंत में ढेर सारी औरते एक ओर देख रही है. मुझे लगा हमेसा की तरह भीड़ की वजह से सीट के लिए झगडा हो रहा होगा. लेकिन वहा से चिल्लाने की नहीं बल्कि हसने की आवाज़  रही थी.तब मुझे लगा यह जरुर झगडा नहीं होगा वर्ना सभी औरते उस तरफ इतने गौर से नहीं देखती. मेरे मन की जिघ्यासा बड़ी. लेकिन करती भी क्या भीड़ काफी थी. लेकिन शायद मेरी जिघ्यासा सच्ची थी. इसलिए अगले स्टेशन की भीड़ ने मुझे धक्का दे कर डिब्बे के अंत में पंहुचा ही दिया. जब मैंने झुक कर देखा तो पता लगा यहाँ जो रंग जमा हुआ है वो विदेश से आई कुछ मेहमानों के लिए है. वहा दो विदेशी महिलाएं बैठी हुई थी. जिन्हें चारो ओर से हमारी महाराष्ट्र की युतियों और बुजुर्गों ने घेर रखा था. सौभाग्यवश, मुझे उन लोगों के विदेशी अतिथि सत्कार समारोह को देखने का मौका मिला. वहां उपस्थित कुल औरतों में  ही महिलायों को अंग्रेजी बोलनी आती थी. लेकिन उन विदेशियों से बात करने की चाहत तो सभी के मन में थी. सभी एक-एक कर अपने सवाल हिंदी में कहते और फिर वो दोनों महिलाएं अंग्रेजी के कुछ शब्दों की सहायता से अपनी बात कहने की कोशिश करती. ऐसा जान पड़ता था की अंग्रेजी बहुत ही छोटी भाषा है जिसमें बेहद कम शब्द हैं. उनकी अंग्रेजी में  तो व्याकरण था और  ही बात को समझने के लिए आवश्यक शब्दों से ज्यादा शब्द. खैर, उस भीड़ में तो वो दोनों महिलाएं ही सबसे अधिक अंग्रेजी जाननेवाली मालूम पढ़ रही थी. दोनों विदेशी महिलाएं हमारे महाराष्ट्र की औरतों के साथ बातें करती बेहद खुश लग रही थी. उन्होंने सभी के एक-एक कर नाम भी पूछे. बातों का सिलसिला कभी भारतीय परिधानों की ओर मुड़ता तो कभी विवाह की ओर.
        इसी बीच मैं अपने लिए कोने में खड़े होने के लिए जगह ढूंड रही ही थी. एक तंदरुस्त औरत के बगल रिक्त स्थान देख कर वहा जा खड़ी हुई. वह औरत भी उस गोरे रंग की ओर काफी आकर्षित थी. इसलिए वह पीछे मुद कर विपरीत देश में खड़ी थी. सभी आने जाने वाले लोग उस पर चिल्लाते, उसे धक्का देते पर उसपर कोई असर पड़ता. उसने तो जैसे अपने देश में आये अतिथियों के सम्मान में अपने आप को समर्पित कर रखा था. मैं जब उसके बगल में खड़ी हुई तो वह उन लोगों को देखने के लिए धीरे-धीरे मुझपर चड़ने लगी. मैंने उसकी ओर देखा और अपने नज़रों से उससे ठीक से खड़े रहने की चेतावनी दी. वो मेरी मूक भाषा को समझ गयी और थोडा किनारे हुई. लेकिन मेरे कुपित नज़रों के धिक्कार से कही अधिक उसे उन गोरों के दर्शन भा गए थे. अब मैं भी क्या करती उस बुजुर्ग महिला से लड़ना मेरे सामर्थ्य और संस्कार दोनों की ही परिधि से बाहर था. फिर अपने हाथो में लिए पुस्तक पर नजरें गडा लिए
      अगले स्टेशन पर एक महिला अपने छोटे से बच्चे के साथ चडी. मैंने उसे अन्दर जाने के लिए कहा. वह अन्दर जा कर ठीक से खड़ी हो पति उसके पहले ही उसकी गोद में बैठा बच्चा रोने लगा. सभी लोगो का ध्यान उसकी तरफ ना चाहते हुए भी खीच गया. गौरतलब है कि, ट्रेन में जब भी कोई शोर मचाता है या कोई बच्चा रोता है तो अक्सर ज्यादातर महिलाएं अपना मुह बिचकाने लगती है. वे उनकी ओर बेहद रोषपूर्ण नज़रों से देखती है. पर आज के इस लोकल डिब्बे के रंग ही अलग थे. बच्चे के रोने की आवाज़ सुनकर दोनों विदेशी महिलाओं ने उसे हँसाने के लिए तालियाँ बजाई और तरीके तरीके के मुह बनाये. पर शायद उस बच्चे को विदेशी प्यार नहीं भाया.  वह और जोर से रोने लगा. तब बाकि सारी महिलायों ने उस बच्चे को चुप करवाने के लिए बड़ी सिद्दत से प्रयास किया. यहाँ तक कि उस महिला को बैठने तक की सीट दे दी. आश्चर्य की बात तो यह थी की मैंने पहली दफा लोकल डिब्बे में महिलाओं को विदेशियों को इतना तवज्जो देते देखा. अगर पुरुष ऐसा करते तो यह बात मुझे इतना खटकती. पर महिलायों के इस व्यवहार से मैं बेहद अश्कार्य चकित थी. खैर कारण जो भी हो यह बात तो सिद्ध हो गयी कि भले ही कुछ लोग भारत में आये विदेशी मेहमानों के साथ दुर्व्यवहार कर रहे हो, उन्हें लुट रहे हो. पर भारतीय महिलाओं में अब ही संसकर कूट कूट कर बहरे है. उन्होंने अपनी संस्कृति को कायम रखा है. धन्य हो नारी.