Saturday, September 22, 2012

सरल, सृजन, सचेत: अटल बिहारी वाजपेयी


                                                                                             
श्री अटल बिहारी वाजपेयी
"एक हाथ में सृजन,                                                                          
        दूसरे में हम प्रलय लिए चलते हैं,                                                  
सभी कीर्ति ज्वाला में जलते,
        आँखों में वैभव के सपने,
पग में तूफानों की गति हो,
        राष्ट्रभक्ति का ज्वर रुकता,
आये जिस-जिस की हिम्मत हो."
                 उपर्युक्त लिखी यह पंक्तियां दुश्मनों को ललकारने के साथ-साथ सृजन और प्रलय से एक साथ  खेलनेवाले राष्ट्रप्रेमी अटल बिहारी वाजपेयी की निर्भीक भावनाएं व्यक्त करती है.
        बचपन में टीवी पर जब भी मैं अटलजी का कछुवें की गति से चलता भाषण सुनती तो हमेशा ऊब  जाती और सोचती के यह बढे ढीले किस्म के प्रधानमंत्री है. शायद इनको कोई ज्ञान नहीं इसलिए इतना सोच-सोच कर बोलते है. मेरा बालमन उस वक़्त यह नहीं समझ पाया कि यह धीमी गति देश पर अपनी अमिट छाप छोड़नेवाले राजनेता के सय्यम, विवेक और अनुभव का फल है.  

शिक्षा के मार्ग पर:
               25 दिसंबर 1924, ग्वालियर की गलियों में पण्डित कृष्ण बिहारी वाजपेयी के घर जन्में अटल बिहारी वाजपेयी एक सफल राजनीतिज्ञ के साथ-साथ कवि भी रहे. अटल जी की बी०ए० की शिक्षा ग्वालियर के लक्ष्मीबाई कालेज में हुई. उनका परिवार संघ के प्रति निष्टावान था. इसलिए छात्र जीवन से वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक बने और तभी से राष्ट्रीय स्तर की वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में भाग लेते रहे. कानपुर के डी०ए०वी० कालेज से राजनीति शास्त्र में उन्होंने एम०ए० की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की. उसके बाद उन्होंने अपने पिताजी के साथ-साथ कानपूर में ही एल०एल०बी० की पढ़ाई भी प्रारम्भ की. पिता और पुत्र का एक ही कक्षा में एकसाथ अध्ययन करना लोगों के लिए अजूबे की बात बन गयी थी. इस जोड़े की कहनियाँ कई वर्षो तक डी०ए०वी० कालेज में प्रचलित रही. साथ ही लोग इस जोड़ी को देखने उनके छात्रावास तक पहुंच जातेलेकिन किन्ही कारणों से उन्होंने पढाई बगैर पूरी किये संघ कार्य में बेहद निष्ठा से जुट गए. एक विद्यालय में छात्रों और शिक्षको को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा था,"विद्यालय एक पावन मंदिर होता है. एक अनुष्ठान का स्थान होता है, वह केवल सटिफिकेट बांटने का कारखाना नहीं होता." बिडंबना है कि आज-कल के संस्थानों के लिए तो शिक्षा बिकाऊ बन गयी है. शिक्षको के प्रति उनमें अटूट श्रद्धा रही हैअध्यापक को शिक्षा का धुरी माननेवाले अटलजी अध्यापन की दुनियां में अपना जीवन बिताना चाहते थे. लेकिन डॉ० श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बलिदान ने उन्हें झकझोर दिया तथा राष्ट्रनिर्माण की दिशा में बढ़ने के लिए व्याकुल कर दिया.
राजनीति में कदम :
                1955 में जनसंघ के प्रत्याशी के रूप में लखनऊ की संसदीय सीट के लिए चुनाव लड़े लेकिन दुर्भाग्यवश उन्हें हार हासिल हुई. "हार नहीं मानूंगा, रार नई ठानूंगा, काल के कपाल पर लिखता-मिटाता हूँ." यह पंक्तियाँ लिखनेवाला कवि निराश होकर हार कैसे मानता. दो साल बाद ही दूसरे आमचुनाव में बलरामपुर से जीत कर वे संसद पहुंचे. तब से वे राजनीति का दामन थाम राष्ट्र्चिन्तन  में डूब गए. वह भारतीय जनसंघ की स्थापना करनेवालों में से एक हैं और सन् 1968 से 1973 तक वह उसके अध्यक्ष भी रह चुके हैंमोरारजी देसाई की सरकार में सन् 1977 से 1979 तक वे विदेश मंत्री रहे और विदेश निति के नए आयाम तलाशने में जुट गएआजीवन अविवाहित रहने का प्रण लिए अटलजी को सन 1996 में 13 दिन के प्रधानमंत्रित्व के बाद बहुमत के आभाव में इस्तीफा देना पड़ा1980 में जनता पार्टी से असंतुष्ट होकर उन्होंने जनता पार्टी छोड़ दी और भारतीय जनता पार्टी की स्थापना में मदद की. "भारत को लेकर मेरी एक दृष्टि है- ऐसा भारत जो भूख, भय, निरक्षरता और अभाव से मुक्त हो।" देश के प्रति ऐसी दृष्टि रखनेवाले अटलजी ने सन 1998 से 2004 तक भारत के प्रधानमंत्री के रूप में देश की बागडोर संभाली. अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने नई टेलीकॉम नीति तथा कोंकण रेलवे की शुरुआत की. साथ ही राष्ट्रीय सुरक्षा समिति, आर्थिक सलाह समिति, व्यापार एवं उद्योग समिति भी गठित कीं. इसके अलावा आवास निर्माण को प्रोत्साहन देने के लिए अर्बन सीलिंग एक्ट समाप्त किया तथा ग्रामीण रोजगार सृजन एवं विदेशों में बसे भारतीय मूल के लोगों के लिये बीमा योजना शुरू कीप्रधानमंत्री अटलजी ने पोखरण में अणु-परीक्षण करके संसार को भारत की शक्ति का एहसास करा दिया.
राजनीति और काव्य में संतुलन:
                विरासत में मिली काव्य के गुण को उन्होंने राजनीति के कारण दबने नहीं दिया. जब भी उन्हें समय मिलता वे तुकबंदी करने बैठ जाते. वे अपनी कविताओं की दुनियां में अटल होकरकैदी कवि राय’ कहलाना ज्यादा पसंद करते थेइसी सृजनता के चलते उन्होने लम्बे समय तक राष्ट्रधर्मपांचजन्य और वीर अर्जुन आदि राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत अनेक पत्र-पत्रिकाओं का सम्पादन भी कियाअटल जी की कलम में कुछ ऐसा जादू रहा कि पत्र की प्रति हाथ में आते ही लोग पहले संपादकीय पढ़ते थे, बाद में समाचार आदि. ऐसा कोई ही देश होगा जहां अटलजी के कदम ना पड़े होउन्होंने एक यायावर की तरह देश व् विश्व के कोने-कोने का भ्रमण किया है. इतने सारे व्यापक अनुभवों की संपदा ने उनके सोच की दुनियां को संवारा है और उसी सोच को उन्होंने अपनी कविताओं में उतारा है. कवि और राजनितिक कार्यकर्त्ता के बीच मेल बिठाने का निरंतर प्रयास करनेवाले अटलजी कहते है,"राजनीति ने मेरी काव्य रसधारा को अवरुद्ध किया है." उनके अनुसार उनके भीतर के कवि ने उन्हें राजनीति के लिए एक नयी दृष्टि प्रदान की है. उनका हिंदी के प्रति बेहद लगाव था. विदेश मंत्री के रूप में 1977 को संयुक्त राष्ट्र संघ के मंच से उन्होंने हिंदी में भाषण देकर हिंदी को गौरान्वित किया. व्यर्थ के अभिप्रायों का वे बेहद विवेक के साथ उत्तर देते थे. फिर चाहे वह कीचड़ की छीटे राजनेता के लिए या कैदी कवि राय की रचनाओं पर पड़ी होवे बेहद सरलता सहजता से विनोदी उत्तर देकर मामले को हल्का कर देते थे. कन्हैयालाल नंदन ने अटलजी की कविताओं के सन्दर्भ में कहा है," अटलजी की कवितायेँ उन अनुभवों और स्मृतियों के विशाल फलक पर खुदे हुए उनके अपने समय के स्तिथिजन्य शिलालेख है."
        मृत्यों से दो-दो हाथ करने का सामर्थ्य रखनेवाले अटलजी का कभी कोई व्यक्तिगत विरोधाभास नहीं दिखा. सन 1992 को उन्हें पद्‍मविभूषण से अलंकृत किया गया. 1994 को उनके सेवाभावी, स्वार्थत्यागी तथा समर्पणशील सार्वजनिक जीवन के लिए 'लोकमान्य तिलक सम्मान' से सम्मानित किया. 17 अगस्त, 1994 को संसद ने उन्हें सर्वसम्मति से 'सर्वश्रेष्ठ सांसद' का सम्मान दिया गया. हालहिं में उन्हें हिस्टरी इंडिया चैनल द्वारा महान भारतीय (द ग्रेट इंडियन) के शीर्ष 10 महारतियों के बीच शामिल किया गया था.  अपने देश के प्रति निष्टावान व् सिद्ध हिंदी कवि रहे बिहारीजी फ़िलहाल राजनीति से संन्यास ले चुके है. विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत के निर्माण में उनका योगदान इतिहास के सुनहरे पन्नो पर लिखा जायेगा. आज देश में जहां भ्रष्टाचार, घोटालों, महंगाई का बोल-बाला है वहां अटलजी जैसे राजनेताओं की सख्त जरुरत है. 

Tuesday, September 4, 2012


दैनिक जागरण में प्रकाशित अनु मालिक और फराह खान की मजेदार जोड़ी पर लिखा लेख।



Thursday, August 9, 2012

"मैं बिकाऊ नहीं"

        "मैं बिकाऊ नहीं" अगर यह प्रण हमारे समाज का हर नौजवान ले ले. और अपनी और अपने जीवनसाथी की अहमियत को समझ जाये तो दहेज़ प्रथा का नाम इतिहास के पन्नो में कही दूर दब जाये. जिसके पन्ने पलटते वक़्त हमारी आगे आनेवाली पीढ़ी गर्व से कहे...यह कुप्रथा तो हमारे समाज में सदियों पहले ही बंद हो गयी. दहेज़-प्रथा पर कई बार चर्चा आपने सुनी होगी. और हर बार यह शब्द पढ़ते वक़्त मन में यही कहा होगा कि अरे न जाने यह लेख लिखनेवाले कौन से ज़माने में जी रहे है. यह प्रथा तो कब कि हमारे यहाँ ख़तम हो चुकी है. हम तो दहेज़ नहीं लेते. और इतने दिनों से इस पर इतना काम किया जा रहा है तो जरुर यह कुप्रथा कब की समाप्त हो गयी होगी. लेकिन मान्यवरों और सखियों आप सभी का ध्यान इस विषय कि ओर आकर्षित करते हुए मैं बताना चाहूंगी कि हमारे खुद के अग्रहरि समाज में अगर अनुपात लिया जाये तो हर तीसरी लड़की का रिश्ता सिर्फ और सिर्फ दहेज़ के कारण टूटता है. फरक सिर्फ इतना है कि पहेल लोग खुले आम दहेज़ को दहेज़ कहकर मांगते थे. लेकिन आज तो अंडर टेबल का जमाना है, इसलिए टी.वी., फ्रीज, गाड़ी-घोडा जैसी कीमती वस्तुओं का सहारा लिया जाता है. सज्जन लोग कहते है, यह तो हमारी प्रथा है दहेज़ थोड़ी न है..अब लड़की झुरे हाथ आये यह अच्छा थोड़े न लगता है. और लड़की वाले भी समाज में अपनी झूटी शान और बेटी के ससुराल में उसका रुतबा बनाये रखने के लिए एक घर बसाने जितना पूरा सामान उसके साथ ख़ुशी-ख़ुशी भेज देते है. कई मामलों में तो एक नया घर ही दे देते है. बुजुर्गों से जब इस बारें में बात करने कि कोशिश कि तो वे कहने लगे कौन-सा हमे वे लादे देते है. जो कुछ भी देंगे बरतन, कपड़ा, अलमारी, टी.वी, फ्रीज, वाशिंग मशीन, इत्यादि वह अपनी ही बेटी के सुख-सुविधा को देंगे न कि हमारे लिए. ऐ.सी लाएगी तो वो उसकी ठंडी हवा में अंगड़ाई लेगी, वाशिंग मशीन अपनी मेहनत को बचाने के लिए ला रही है, अलमारी में वो अपने ही कपडे रखेगी, उसके पिता ने दिए हुए बिस्तर पर खुद सोएगी न कि हम उसपर जा लोटेंगे. यहाँ तक कि कुछ ने तो कहा कि यह सब लाकर वह हमपर कोई एहसान तो कर नहीं रही बल्कि हमारे घर में आ कर रहेगी उसका क्या. वाह रे! समाज, जब हमारे घर कोई नया मेहमान आता है तो क्या हम उसे कहते है भाई तू अपना बोरियां बिस्तर भी साथ ले आ. हामरे घर में टी.वी., फ्रिज नहीं अगर ठंडा पानी पीना हो, धारावाहिक देखना हो तो हमारी बहु की तरह तू भी अपने साथ यह सब लेते आ. सही मायनों में देखा जाये तो इन सब चीजों को दहेज़ का नाम देना ठीक न होगा. यह तो उस नयी दुल्हन का अपने पति के घर में रहने का किराया है. जो उसके मां-बाप उसके ससुराल वालों को देते है. गौरतलब है कि दहेज़ के पक्ष में ज्यादातर घर की महिलाएं ही बोलती है. शायद वे यह भूल जाती है कि वे भी किसी कि बेटी और अब किसी बेटी की मां है. जब इस बारें में युवा पीढ़ी की राय जाननी चाही तो वे कहने लगे हम तो दहेज़ के सख्त खिलाफ है. मैंने तो अपनी शादी में अपने ससुरालवालों से कुछ नहीं माँगा. हाँ, जो उनकी ख़ुशी थी, जितनी उनकी हैसियत थी उतना उन्होंने दिया. उसपर मैंने कोई टिक्का-टिपण्णी नहीं की. अब ऐसे दुल्हेराजा को मैं उदारवादी कहू या उनके दोगुलेपन पर हसू. यह तो वही बात हुई कि मैं घूस मांगता नहीं मगर अगर कोई जबरदस्ती दे जाये तो मना भी नहीं करता. पढ़ी-लिखी लड़कियां कहती है हम मजबूर है अगर इनकी मांग को पूरा नहीं किया तो हमारे घर रिश्ते आना बंद हो जायेंगे. मैं कहती हु जो शादी से पहले आपके घर में प्रवेश मात्र के लिए पैसे लेता हो, वे लोग क्या आपको ख़ुशी दे पाएंगे. वे तो सिर्फ पैसों से प्यार करते है. उनके लिए बेटे की शादी का मतलब बहूं लाना नहीं बल्कि घर के लिए नया फर्नीचर और इलेक्ट्रोनिक आयटम लाना हुआ. 
          एक लड़की शादी कर अपना पूरा जीवन अपने पति के नए परिवार को अपनाने में, उसकी सेवा में समर्पित करती है. जिन्होंने उसे पाला-पोसा उनकी उँगलियों को छोड़ अपने पति का हाथ थाम नए माहौल में ढलती है. ऐसे में उसका इज्जत और प्रेम के साथ घर में स्वागत करने की बजाय उसे घर में आने के लिए कीमत देनी पड़ती है. यह तो ठीक वैसा ही हुआ जैसे किसी होटल में रहने के लिए एक निश्चित कीमत दी जाती है. जितनी ज्यादा आप खर्च करेंगे उतनी ही अच्छी सुविधा और इज्जत आपको वहां मिलेगी. वैसे ही सुसराल में जितना ज्यादा दहेज़ देंगे उतनी ही ज्यादा इज्जत और अपनापन आपको मिलेगा. वरना होटल का बिल न चूका पाने की स्तिथि में बर्तन तो मांजने ही है. आज हर मां-बाप अपनी बेटी को खूब पढ़ाते-लिखाते है, उन्हें सफलता की उचाईयों को छूता देखना चाहते है. घर में बेटे और बेटी में कोई फरक न कर दोनों को एक जैसी परवरिश देते है तो क्यों अपने बेटी के शादी में बेटे से अधिक खर्चे,क्यों बड़ी-बड़ी डिग्रियां देने के बाद भी उनके लिए लड़का ख़रीदे? 
इस प्रथा को एक और तरीके से देखा जाये तो यह लडको को बेचना हुआ. माफ़ कीजियेगा मगर यह कहकर मेरा किसी की भावनाओं को ठेस पहुचाने का कोई मकसद नहीं है. मैं तो सिर्फ जो दिख रहा है और जो संसार का नियम है उसी की तुलना कर बात कर रही हु. जब हम कोई चीज़ घर लाते है तो उसकी एक सही कीमत चुकानी पड़ती है. वैसे ही लड़की के माता-पिता अपनी बेटी के लिए योग्य पति खरीदते है. दहेज़ ही तो उनके दामाद की कीमत होती है. रिश्ता तय करने से पहले ही खर्चे और लेना-देना तय कर लिया जाता है. तय करने के लिए यहाँ तो बोली भी लगती है. मोल-भाव भी बड़े सलीके से होता है. बेटा डॉक्टर, इंजीनियर हो तो कीमत १० लाख से ऊपर की होती है. शिक्षक या बैंक में नौकरी करता हो तो दो पहियाँ, चार पहियाँ में बात बनती है. यहाँ हर प्रोफैसन के लिए एक निश्चित कीमत है. शादी के इस बाजार में हर लकड़ा एक निश्चित प्राइज टैग के साथ आता है. उसके आस-पास ही मोल-भाव होता है. अगर लड़कीवालों की तरफ से दी जानेवाली राशी का प्रस्ताव लड़के को पसंद आ गया तो वह रिश्ते के लिए हाँ कर देता है वह भी इस लहजे में की वह अब भी अपने जरूरतों के साथ समझौता कर रहा है. हास्यस्पद है कि हमारे यहाँ शादी के शुरुवाती रस्मों को व्यापर की तरह ही नाम दिए गए जैसे बयाना, बरीक्षा, लेन-देन, इत्यादि. यानि यह दो सजीवों, दो परिवारों का मिलन न होकर एक लेन-देन , एक सौदा हुआ.
         जब तक हम दहेज़ लेना और देना नहीं बंद करते तब तक इस प्रथा का ख़तम होना नामुमकिन है. हम या तो इसके खिलाफ हो सकते है या इसके साथ. बीच का तो कोई रास्ता ही नहीं होता. अगर आप कहते है की मैं अपने बेटे की शादी में दहेज़ नहीं लूँगा लेकिन बेटी की शादी में अगर मांग हुई तो देने के आलावा कोई विकल्प नहीं रह जायेगा. तो मैं कहूँगी कि आप अब भी दहेज़ प्रथा का समर्थन कर रहे है. हमे नाजों से पली हुई अपनी बेटी को व्याहते समय अपनी झूठी शान के नाम पर कोई भी सामान देना बंद करना होगा. फिर चाहे आप कितने ही अमीर हो. अगर आप सचमुच अपनी बिटियाँरानी को कुछ देना ही चाहते है तो उसके नाम कोई बिमा करवाना या उसके नाम पर पैसे जमा करवाना बेहतर विकल्प है. यह दहेज़ का लालच ही होता है जो कई दफा घरेलु हिंसा का कारण बनता है. इसलिए बेहद जरुरी है कि अब हम इस दकियानूसी सोच के खिलाफ अपनी कमर कस ले और इसका केवल शाब्दिक विरोध करने कि बजाय ढृढ़ निश्चय के साथ इसके खिलाफ खड़े हो. और अपने घर में यहाँ तक कि अपनी स्वयं की शादी में न दहेज़ दे और न ले. साथ ही अपने आस-पास हो रही ऐसी गतिविधियों को रोके. केवल कागज पर लिख कर या इसे पढ़ कर इसके विरुद्ध चंद मिनट बहस कर कुछ हासिल नहीं होगा. आपका बेटा न बिकाऊ है और ना ही आप उसे बेचे. उसके आत्मसम्मान को जागृत करे. और मेहनत की कमाई का सुख उसे समझाए न कि भीक में मिलने वाले टुकड़ों का लालच उसे अपने बिरासत में दे. एक-जुट खड़े हो और बेहद ईमानदारी से इसका विरोध करे. विवाह प्यार और सौहादर्य से बनता है न कि पैसों से. पैसों से जुड़े रिश्ते कभी दिल के तारों को नहीं जोड़ पाते.
   एक स्वस्थ समाज के लिए उसकी बिमारियों को जड़ से उखाड़ फेकना बेहद जरुरी है. और दहेज़ प्रथा हमारे समाज के लिए कोढ़ की तरह है. 

Saturday, July 7, 2012


दैनिक जागरण की ब्लॉग पर प्रकाशित मेरा सबसे पहला लेख...जो सौम्या अपराजिताजी की सहायता के बगैर लिख पाना नामुमकिन था...


आकर्षक व्यक्तित्व के धनी: जॉय मुखर्जी







आकर्षक व्यक्तित्व के धनी:  जॉय  मुखर्जी


जन्मदिन:  27  फरवरी
हिंदी फिल्मों के आकर्षक अभिनेताओं  में शुमार जॉय  मुखर्जी को फिल्मी पृष्ठभूमि उनके पिता शशिधर  मुखर्जी से विरासत में मिली। उन्होंने विरासत में मिली अभिनय प्रतिभा को निखारा-संवारा और धीरे-धीरे वे 60  के दशक के लोकप्रिय अभिनेताओं  की सूची में शामिल हो गए। 
महिला प्रशंसकों के चहेते जॉय  मुखर्जी के फिल्मी कॅरिअर  की शुरूआत पिता शशिधर  के होम-प्रोडक्शन की फिल्म लव इन शिमला से हुई। 1960  में बनी यह फिल्म जॉय  मुखर्जी और सह-अभिनेत्री साधना के लिए अत्यंत सफल साबित हई।  लव इन शिमला में देव की भूमिका में जॉय  के अभिनय की बेहद सराहना हुई। 1964  और 1966  में उन्होंने  दो और सफल फिल्में दीं-जिद्दी और लव इन टोकियो।
उन्होंने बहुत ही कम अवधि में अनेक फिल्मों में अपने अभिनय का परचम लहराया। आशा पारेख, ाधना, माला सिन्हा और सायरा  बानो जैसी सुप्रसिद्ध व सफल अभिनेत्रियों के साथ उनकी रोमांटिक जोडि़यां बेहद पसंद की गई। 1963  में बनी फिल्म फिर वहीं दिल लाया हूं जॉय  मुखर्जी के कॅरिअर  की उल्लेखनीय फिल्म रही जिसमें उन्होंने अपने कॅरिअर  की सबसे यादगार भूमिका निभायी। देखते-ही-देखते जॉय  सफलता की बुलंदियों पर पहुंच गए। वक्त बीतता गया और धर्मेद्र, जितेंद्र, राजेश खन्ना जैसे अन्य अभिनेताओं  के उभरने से जॉय  मुखर्जी की छवि धूमिल होने लगी। अपनी गिरती लोकप्रियता के मद्देनजर  जॉय  चुनींदा  फिल्में ही करने लगें। उन्होंने अभिनय के क्षेत्र में अपनी कला के प्रदर्शन के साथ-साथ फिल्मों के निर्माण और निर्देशन की ओर भी रूख  किया। दुर्भाग्यवश, फिल्म निर्माण-निर्देशन में भी उन्हें सफलता नहीं मिल पायी। फिल्मी कॅरिअर  से परे जॉय  मुखर्जी ने छोटे पर्दे पर भी अपनी मौजूदगी दर्ज करायी। 2009  में उन्होंने  धारावाहिक ऐ दिल-ए-नादान में अपने अभिनय का प्रदर्शन किया।
जॉय मुखर्जी का परिवार हिंदी फिल्मों में रचा-बसा है। उनके मामा अशोक कुमार और किशोर कुमार की सफलता और लोकप्रियता किसी से छिपी नहीं है। उनकी भतीजी काजोल और भांजी रानी मुखर्जी हिंदी फिल्मों का अहम हिस्सा हैं। गौरतलब है कि मुखर्जी परिवार की तीसरी पीढ़ी इस समय हिंदी फिल्मों में सक्रिय है।
जॉय  मुखर्जी हिंदी फिल्मों के बेहद सफल अभिनेताओं  की सूची में भले ही शामिल नहीं हो पाए हों, पर सिल्वर स्क्रीन के इस रोमांटिक अभिनेता पर फिल्माए  गए सुरीले और मधुर गीत आज भी उनके प्रशंसकों के दिलों में गूंजते हैं।
कॅरिअर  की मुख्य फिल्में
वर्ष-फिल्म-चरित्र
1960- लव  इन शिमला- देव कुमार मेहरा
1960- हम  हिन्दुस्तानी- सतेन्द्र नाथ
1962- उम्मीद
1962- एक  मुसाफिर एक हसीना
1963- फिर  वही दिल लाया हूं
1964- जिद्दी
1964- जी  चाहता हैं
1964- इशारा
1964- दूर  की आवाज
1964- आओ  प्यार करे
1965- बहू बेटी- शेखर
1966- ये  जिंदगी कितनी हसीन हैं
1966- साज और आवाज
1966- लव  इन टोकियो- अशोक
1966- शागिर्द- राजेश
1968- हमसाया (निर्माता-निर्देशक)
1968- एक  कली मुस्कायी
1968- दिल  और मुहब्बत- रमेश चौधरी
1969- दुपट्टा
1970- पुरस्कार- राकेश
1970- मुजरिम- गोपाल
1970- इंस्पेक्टर- राजेश
1970- एहसान
1970- आग  और दाग
1971- कहीं  आर कहीं पार
1972- एक  बार मुस्कुरा दो
1977- हैवान
1977- छलिया  बाबू (निर्देशक)
1985- इंसाफ  मैं करूंगा

Friday, June 29, 2012

दैनिक जागरण में प्रकाशित लेख ...


Tuesday, June 19, 2012


दैनिक जागरण समाचार पत्रिका में प्रकाशित मेरा सबसे पहला लेख... 




Sunday, April 8, 2012

चल कही दूर चले




मेरे प्यारे साथी,
चल कहीं दूर चले,
हाथ बढा और थाम ले मुझे,
अपना-सा नहीं अपना बना ले मुझे,
मेरे प्यारे साथी,
चल कहीं दूर चले,
इस खुदगरजी दुनियां को भूल चले,
नयी दिशा में, नयी उमंग के साथ,
अपनी नयी मंजिल की ओर बढ़े,
चल कहीं दूर चले,
मेरे प्यारे साथी,
चल कहीं दूर चले,
तम संगिनी बन,
नव उम्मीदों के संग,
सपनो की नगरी में सैर करे,
मेरे प्यारे साथी,
चल कहीं दूर चले,
मेरे माथे पर होगी कभी शिकन
चूँकि पसंद नहीं तुम्हे मेरे पलकों की नमी,
संग मुस्कुराने का सच्चा वादा करें,
चल कही दूर चले,
मेरे प्यारे साथी,
चल कहीं दूर चले,
बढ चले उस नगरी की ओर,
जहां अतीत का साया तक हो,
एक-दूजे के दामन में खुशियां भरें,
चल कहीं दूर चले,
चल कहीं दूर चले,
नैनों की निशब्द भाषा में.
सुनहरे एहसासों की,
अपनी एक नयी कहानी रचे,
चल कहीं दूर चले,
मेरे प्यारे साथी,
चल कहीं दूर चले,