सीता से लेकर द्रौपदी तक किसी भी पौराणिक कथा की महिला पात्र को उठा लीजिए। सबके जीवनगाथा से एक बात स्पष्ट रूप से उभर कर आती है, वह है हर कथा में स्त्री को अपनी उपयोगिता के अनुसार इस्तेमाल किया गया है। हर पात्र ने स्त्री को अपनी सुविधानुसार अधिकार और आजादी देने की कोशिश की। अहल्या, सीता, द्रौपदी, कुंती आदि चरित्रों की कहानी पढ़ते और सुनते वक्त उनके मजबूत व्यक्तित्व, दृढ़ इच्छाशक्ति, आजादीपसंद मिज़ाज और आत्मविश्वास को देखकर मैं तो दंग ही रह गई। कितनी बेबाक थी अहल्या, कितनी दृढ़ थी सीता, द्रौपदी का आत्मविश्वास, कुंती की इच्छाशक्ति इनके ये सभी गुण मुझे सचमुच चकित करते हैं। साथ ही यह एहसास भी कराते हैं कि महिलाएं अचानक से अपने खोल से बाहर निकलने के लिए उत्सुक नहीं हुई हैं, बल्कि जब से उन्हें बांधने की कोशिश की जा रही है, तब से ही वे अपने अधिकारों के लिए लड़ती रहीं हैं। अंतर इतना है कि पुरुष पात्रों की विरोध की, लड़ाई की, खिलाफत की वीरगाथाएं खुशी-खुशी, कॉलर चढ़ाकर सुनाई जाती हैं तो वहीं स्त्रियों के समाज की विद्रूपताओं, असमानताओं के विरोध के स्वरों को हमेशा से दबाने की कोशिश की जाती रही है। जिसने भी अपने समय की विद्रूपताओं, विसंगतियों को उजागर करने की कोशिश की हमेशा से उन सभी के चरित्र पर प्रश्न उठाकर उनके पात्र को दबा दिया गया। स्त्री को हमेशा सर्पोटिंग कैरेक्टर के तौर पर पेश किया गया। खुशी है कि आज के समय के देवदत्त पटनायक, प्रतिभा राय, डॉ. नरेंद्र कोहली, नमिता गोखले जैसे कुछ लेखकों ने इन ऐतिहासिक महिलाओं के नज़रिए से भी कहानियां कहीं। जिसने हमें इन्हें करीब से जानने का मौका दिया।
मेरा मानना है कि हर ऐतिहासिक पुरुष ने अपनी पत्नी, बहन, मां, बेटी का पात्र इसलिए कुचला क्योंकि उन्हें डर था कि ये उभरी तो इनका नाम इतिहास के पन्नों में हमसे पहले, हमसे ऊपर होगा। फिर चाहे बात राम की हो, गौतम की हो या फिर पांडवों की। सीता, अहल्या और द्रौपदी का पात्र इतना सशक्त है कि कोई भी दूसरा पात्र इनके आस-पास तक खड़ा होता नहीं दिखता। फिर चाहे बात सीता के धरती में समाने की हो, गर्भवती होने के बावजूद जंगल में जीवन बिताने की हो या अहल्या का सामाजिक जीवन त्यागने का निर्णय, इंद्र के साथ संबंध बनाने की बात स्वीकारने का मामला या द्रौपदी के पांच पतियों को स्वीकार करने, सचमुच किसी मनुष्य के रक्त से अपने बालों को धोने की कथा ये सबकुछ इन तीनों स्त्रियों के व्यक्तित्व की दृढ़ता, आत्मसम्मान, आत्मनिर्भरता और स्वाभिमान को दर्शाता है।
मेरा मानना है कि हर ऐतिहासिक पुरुष ने अपनी पत्नी, बहन, मां, बेटी का पात्र इसलिए कुचला क्योंकि उन्हें डर था कि ये उभरी तो इनका नाम इतिहास के पन्नों में हमसे पहले, हमसे ऊपर होगा। फिर चाहे बात राम की हो, गौतम की हो या फिर पांडवों की। सीता, अहल्या और द्रौपदी का पात्र इतना सशक्त है कि कोई भी दूसरा पात्र इनके आस-पास तक खड़ा होता नहीं दिखता। फिर चाहे बात सीता के धरती में समाने की हो, गर्भवती होने के बावजूद जंगल में जीवन बिताने की हो या अहल्या का सामाजिक जीवन त्यागने का निर्णय, इंद्र के साथ संबंध बनाने की बात स्वीकारने का मामला या द्रौपदी के पांच पतियों को स्वीकार करने, सचमुच किसी मनुष्य के रक्त से अपने बालों को धोने की कथा ये सबकुछ इन तीनों स्त्रियों के व्यक्तित्व की दृढ़ता, आत्मसम्मान, आत्मनिर्भरता और स्वाभिमान को दर्शाता है।
बुजुर्गों और पंडितों ने इनसे केवल त्याग, समर्पण और अच्छी बेटी, बहन, पत्नी, बहू और माँ बनने की प्रेरणा लेने को कहा, लेकिन सही मायनों में इनकी गाथा एक आत्मनिर्भर और सशक्त व्यक्तित्त्व बनाने की प्रेरणा देता है। सारा खेल फ्रेम ऑफ रेफरेंस का है। इन्हें बिचारी, लाचार, नाजुक दिखाकर धर्म रक्षकों ने स्त्री को अपने हित के अनुसार ढालने की कोशिश की। पर अगर सचमच इन कथाओं और पात्रों से कुछ सीखना है तो आज की महिला को अपने अस्तित्व, अपनी निजता और अपने हक़ को पाने के लिए लड़ने-भिड़ने की प्रेरणा लेनी चाहिए।
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रामायण के एक दृश्य को दर्शाती मधुबनी पेंटिंग |
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